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Mar 05, '11



अर्जुन सिंह नहीं रहे. उनका न रहना बहुत से अखबारों की पहले पन्ने की सुर्खी भी नहीं बना. ऐसा नहीं है कि अर्जुन सिंह कोई छोटी-मोटी हस्ती थे. एक लंबा समय अर्जुन सिंह ने इस देश की राजनीति में न केवल बिताया बल्कि कई महत्वपूर्ण ऐसे फैसले भी लागू करवाए जिन्होंने देश की राजनीति और समाज की दिशा ही बदल दी. आज अगर सोनिया गांधी और उनके सुपुत्र सक्रिय राजनीति में हैं तो उसके लिए दो लोग ही श्री के हक़दार हैं, एक स्वर्गीय सीताराम केसरी और दूसरे अर्जुन सिंह. क्या गांधी परिवार ने इन दोनों के साथ न्याय किया? तय आप ही करें… बहरहाल अर्जुन सिंह को अपनी तरह से याद कर रहे हैं श्री राम तिवारी…
http://hastakshep.com/?p=4049




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Sep 12, '10



राजनैतिक, आर्थिक, संस्कृतिक मुद्दो और आम आदमी के सवालो पर सार्थक हस्तक्षेप के लिये देखें
http://hastakshep.com/ 

सरकार करे अपना काम, कोर्ट की फिर क्या दरकार 
जब सरकार जनता का गला घोंटने पर उतारू हो जाए क्या तब भी कोर्ट सरकार के कामों में दखल न दे? क्या कारण है कि आम आदमी को आज सरकार पर भरोसा नहीं है लेकिन कोर्ट पर है? क्या इसके लिए सरकार जिम्मेदार नहीं है? फिर जब सरकार कमजोर होगी तो न्यायपालिका और कार्यपालिका हावी होगी ही। पिछले दो दशक में कार्यपालिका एकदम बेलगाम हो गई है और निश्चित रूप से इसके लिए सरकारें और राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं। गृह सचिव जी के पिल्लई और छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन जैसों की यह हैसियत किसने बनाई है कि वह राजनीतिक सवालों पर बयानबाजी करें। खुद प्रधानमंत्री से उनके राज्य मंत्रियों ने मिलकर शिकायत की कि उनकी बात सरकार में नहीं सुनी जाती है। समझ लीजिए स्थिति कितनी गंभीर है, जब मंत्रियों का यह हाल है तब आम आदमी की तो बिसात ही क्या है? क्या यह सच नहीं है कि उन कुछ एक मंत्रियों की बात छोड़ दी जाए जो या तो प्रधानमंत्री या 10 जनपथ के नज़दीकी हैं, ब्यूरोक्रेसी बात नहीं सुनती है। फिर केवल सुप्रीम कोर्ट को दोष क्यों देते हैं? बड़ी संख्या में जनहित याचिकाएं किसलिए दायर की जा रही हैं? क्योंकि सरकार आम आदमी की बात नहीं सुन रही। न्यायपालिका और कार्यपालिका को यह खाली मैदान किसने छोड़ा है? क्या इसके लिए हमारे नीति निर्माता और राजनीतिक दल जिम्मेदार नहीं है? जब माफिया, गुण्डे, मवाली और धनपशु राजनीति में आएंगे तो न्यायपालिका और कार्यपालिका विधायिका पर हावी हो ही जाएंगे। इसलिए अगर सुप्रीम कोर्ट की सीमा रेखा तय होनी चाहिए तो सरकार को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए क्योंकि सरकार गरीबों के वोट से बनती है टाटा, बिरला, अंबानी और यूनियन कार्बाइड के नोट से नहीं। इसलिए मनमोहन सिंह जी अपनी चिंताओं में आम आदमी को शामिल करिए पूंजीपतियों को नहीं, कोर्ट का दखल अपने आप रुक जाएगा। 

मीडिया में हिन्दू औरतें
पितृसत्तात्मक समाज में विज्ञापनों के जरिए हैट्रोसेक्सुअल मर्द परिप्रेक्ष्य में इमेज बनायी जाती हैं। इस परिप्रेक्ष्य में स्त्री को शारीरिक आकर्षण के साथ जोड़कर पेश किया जाता है।मर्द की पहचान इस संकेत से होती है कि उसके साथ कितनी आकर्षक स्त्रियां जुड़ी हैं। जो औरत शारीरिक तौर पर जितनी आकर्षक होगी उसके सहयोगी मर्द की उतनी ही प्रतिष्ठा होगी।फलत: मीडिया की स्त्री इमेजों और कामुकता से अंतत: पुरूष लाभान्वित होता है। यही वजह है कि कामुकता लिंगभेद की धुरी है, पुंसवादी वर्चस्व का आधार है।मीडिया में समर्पित कामुक औरत का रूपायन जेण्डर हायरार्की की सृष्टि करता है। 
 

हिन्दू भाइयों राम राम, मुस्लिम भाइयों सलाम, वोट का सवाल है बाबा
अत्याचारियों का कोई धर्म नहीं होता है। अत्याचारी अत्याचारी होता है लुटेरा लुटेरा होता है। भारत एक बहुधर्मीय, बहुजातीय देश है। इसकी एकता और अखंडता को बनाये रखना हमारी आपकी जिम्मेदारी है यदि इन्सान ही नहीं रहेगा तो भूलोक का कोई अर्थ नहीं रह जायेगा। आज जरूरत है इंसान और इंसानियत को बनाये रखने की।







Jun 14, '10




सुधरते क्यों नहीं लाशों के सौदागर
भोपाल गैस कांड के सबसे बड़े मुजरिम वारेन एंडरसन को भारत से भगाने को लेकर आरोप- प्रत्यारोप का दौर जारी है। इस मामले में एकमात्र जीवित बचे अहम गवाह अर्जुन सिंह की चुप्पी और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह का अपनी ही तत्कालीन केन्द्र सरकार पर अप्रत्यक्ष वार भी मामले को गम्भीर बना रहा है। इस राजनीति के खेल में असल सवाल पीछे छूटते जा रहे हैं और भोपाल के पीड़ितों के जख़्म और हरे होते जा रहे हैं। सवाल यह है कि अगर यह सच सामने आ भी जाए कि एंडरसन को भगाने में किसकी मुख्य भूमिका थी, तो क्या पीड़ितों के जख्म भर जाएंगे? क्या इससे एंडरसन भारत को मिल जाएगा?




मीडिया की रिपोर्ट्स में यह बात तो खुलकर सामने आ गई है कि एंडरसन को भगाने के लिए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के आदेश थे। लेकिन अकेले अर्जुन सिंह के बल पर एंडरसन भारत छोड़कर नहीं भाग सकता था, जब तक कि केन्द्र सरकार का वरदहस्त उसे हासिल नहीं हो। भले ही आज अर्जुन सिंह उसी तरह का दबाव महसूस कर रहे हों जैसा कि एंडरसन को भगाते वक्त महसूस कर रहे थे, लेकिन एक बात तो साफ है कि अगर अर्जुन सिंह इसके अकेले गुनाहगार होते तो एंडरसन गिरफ्तार ही नहीं हुआ होता। फिर एंडरसन अकेले अर्जुन के दम पर तत्कालीन राष्ट्रपति का मेहमान नहीं बन सकता था।



अब भले ही कांग्रेसजन दलील दें कि तत्कालीन राज्य सरकार ने ही एंडरसन को भागने दिया। लेकिन यह राज्य सरकार थी किसकी ? कांग्रेस की ही न ? तो कांग्रेस अपनी नैतिक जिममेदारी से कैसे मुंह चुरा सकती है ? जो लोग कांग्रेसी कल्चर से वाकिफ हैं वह अच्छी तरह जानते हैं कि उस समय एक कांग्रेसी मुख्यमंत्री की औकात गांधी दरबार में एक थाने के दरोगा से ज्यादा नहीं होती थी और इतना बड़ा फैसला लेने के बाद तो उसका मुख्यमंत्री बने रहना संभव ही नहीं था।



इसलिए एक बात तो साफ है कि एंडरसन को बचाने में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की महत्वपूर्ण भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता, भले ही आरके धवन, जयंती नटराजन और सत्यव्रत चतुर्वेदी कुछ भी सफाई देते रहें। इस बात को ऐसे भी समझा जा सकता है कि अगर अर्जुन सिंह पर दबाव ज्ञानी जैल सिंह की तरफ से होता तो उन्हें जुबान खोलने में एक मिनट भी नहीं लगता। क्योंकि उस समय तक ज्ञानी जी की हैसियत आज से दो साल पहले तक के मनमोहन सिंह से ज्यादा नहीं थी। उनकी चुप्पी ही बयां कर रही है कि उनके ऊपर


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 बात बोलेगी हम नहीं http://batbolegihamnahin.blogspot.com/#ixzz0qp6RZ28A








Apr 19, '10



दंतेवाड़ा पर लानत-मलानत करने वाले मीडिया ने एक दिन पहले ही यह खबर क्यों नहीं दी कि जवान इस घटना से पहले आदिवासियों की एक बस्ती में गए थे और नक्सलियों की सर्च के नाम पर उन्होंने 26 महिलाओं के साथ बदसुलूकी की थी और एक महिला का हाथ भी तोड़ दिया था। यह खबर सिर्फ एक समाचार एजेंसी के द्वारा तब जारी की गई जब नक्सलियों ने दंतेवाड़ा को अंजाम दे दिया।

हम यह स्वीकार करने के लिए तैयार क्यों नहीं हैं कि नक्सली हिंसा हमारी 60 सालों की राजनीतिक और प्रशासनिक असफलता का नतीजा है। आजादी के बाद विकास का जो पूंजीवादी रास्ता अपनाया गया उसकी परिणिति यह होनी ही थी। यहां यह भी याद रखना चाहिए कि नक्सलवादी आंदोलन जम्मू-कश्मीर, पंजाब और पूर्वोत्तर के राज्यों की तरह या ‘हिन्दू राष्ट्र’ की तरह अलगाववादी आंदोलन नहीं है। 


दंतेवाड़ा का गुनहगार कौन?-
अमलेंदु उपाध्याय

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलियों के हमले में सीआरपीएफ के 76 जवानों के मारे जाने के बाद देश भर में गम और गुस्से का माहौल है। देश के असफल गृह मंत्री और कॉरपोरेट जगत के अच्छे वकील पी चिदंबरम भी काफी गुस्से में बताए जाते हैं। यहां तक कि चिदंबरम अपने इस्तीफे की भी पेशकश कर चुके हैं। लेकिन, जैसा कि तय था, प्रधानमंत्री ने उनका इस्तीफा नामंजूर कर दिया है और उन्हें खून की होली खेलने की मौन स्वीकृति दे दी है।

जाहिर है एक सभ्य समाज में ऐसे नृशंस हमले की इजाजत किसी भी आधार पर नहीं दी जा सकती है। लेकिन इस हमले की पृष्ठभूमि और उसके मूल कारण पर भी सम्यक विचार की जरूरत है। कई रक्षा विषेशज्ञ और पुलिस के बड़े अफसरों समेत प्रधानमंत्री और यहां तक कि लोकतंत्र के तथाकथित चौथे स्तंभ मीडिया के कई बड़े पत्रकार भी नक्सलवाद को देश के लिए सबसे गंभीर चुनौती बता चुके हैं। इसके बावजूद सर्वाधिक गंभीर चुनौती से निपटने के लिए सरकार के पास कोई कारगर योजना नहीं है बल्कि सरकार गृह मंत्री के नेतृत्व में स्वयं खून की होली खेल रही है।

अब आवाजें उठ रही हैं कि नक्सलियों के खिलाफ वायुसेना को उतारा जाना चाहिए। इस तर्क के समर्थन में बहुत निर्लज्जता के साथ देश के कई बड़े पत्रकार और राजनेता उतर आए हैं। पुलिस के रिटायर्ड अफसर तो खैर हैं ही चिदंबरम के समर्थन में। पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह का कहना है- ‘छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने जिस प्रकार से जवानों का खून बहाया है वह देश के लिए गंभीर चुनौती है। ऐसी चुनौती जिसका जवाब उन्हीं की भाषा में देना होगा’। लेकिन सवाल यह है कि क्या हवाई हमले से नक्सलवाद खत्म हो जाएगा? अगर इस बात की गारंटी दी जाए तो क्या बुराई है?

नक्सलवाद के इतिहास पर नजर डालें तो यह बात सामने आती है कि अतीत में जितनी बार भी दमन और हत्याओं और फर्जी एन्काउन्टरों की झड़ी लगाई गई, नक्सलवाद उतनी ही तेजी से फैला क्योंकि हमारी सरकारों की नीयत नहीं बदली। जिस कदम के लिए चिदंबरम की पीठ थपथपाई जा रही है वैसा कदम तो सिद्धार्थ शंकर रे बहुत पहले ही उठा चुके हैं, लेकिन नतीजा क्या निकला? यही कि बंगाल के एक गांव से शुरू हुआ आंदोलन आज पन्द्रह राज्यों में फैल गया। अब जब चिदंबरम दो तीन साल में नक्सलवाद के सफाए की बात कर रहे हैं तो तय मानिए कि इन दो तीन सालों में ही पूरा देश नक्सलवाद की गिरफ्त में होगा। बस दुआ कीजिए चिदंबरम सही सलामत देश के गृह मंत्री बने रहें।

फिर हम यह स्वीकार करने के लिए तैयार क्यों नहीं हैं कि नक्सली हिंसा हमारी 60 सालों की राजनीतिक और प्रशासनिक असफलता का नतीजा है। आजादी के बाद विकास का जो पूंजीवादी रास्ता अपनाया गया उसकी परिणिति यह होनी ही थी। यहां यह भी याद रखना चाहिए कि नक्सलवादी आंदोलन जम्मू-कश्मीर, पंजाब और पूर्वोत्तर के राज्यों की तरह या ‘हिन्दू राष्ट्र’ की तरह अलगाववादी आंदोलन नहीं है। लेकिन देश के बाहरी शत्रु इस फिराक में जरूर बैठे हैं कि कब नक्सलियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई हो और फिर सारी दुनिया को बताया जाए कि भारत में गृह युद्ध छिड़ गया है। ऐसी स्थिति बनने के लिए केवल और केवल एक शख्स जिम्मेदार होगा जिसका नाम पी चिदंबरम है और जो दुर्भाग्य से इस समय देश का गृह मंत्री है। फिर नक्सलवादी अलगाववादी नहीं हैं। उन्होंने अलग मुल्क बनाने की बात नहीं की है। वह व्यवस्था बदलने की बात करते हैं। संविधान बदलने की बात करते हैं। संविधान बदलने की बात तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी करता है। नक्सलियों ने कोई बाबरी मस्जिद नहीं गिराई है।

हालांकि चिदंबरम ने बहुत सधे हुए पत्ते फेंके थे। मसलन ऑपरेशन ग्रीन हंट प्रारंभ करने से पहले अखबारों और प्रचार माध्यमों के जरिए नक्सलियों के खिलाफ मिथ्या प्रचार की न केवल संघी और गोयबिल्स नीति अपनाई गई बल्कि नीचता की पराकाष्ठा पार करते हुए एक विज्ञापन जारी किया गया जिसमें कहा गया -पहले माओवादियों ने खुशहाल जीवन का वायदा किया/फिर, वे पति को अगवा कर ले गये/फिर, उन्होंने गांव के स्कूल को उड़ा डाला/अब, वे मेरी 14 साल की लड़की को ले जाना चाहते हैं।/रोको, रोको भगवान के लिए इस अत्याचार को रोको।

यह विज्ञापन गृह मंत्रालय द्वारा जनहित में जारी किया गया जिसके मुखिया चिदंबरम हैं। जाहिर है उनकी सहमति से ही यह जारी हुआ। इसके तुरंत बाद गृह मंत्री गली के शोहदों की स्टाइल में कह रहे थे कि नक्सलियों को दौड़ा-दौड़ा कर मारेंगे। एक तरफ वह नक्सलियों को मारने की बात कह रहे थे तो दूसरी तरफ ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ जैसे किसी ऑपरेशन के जारी होने को नकार भी रहे थे। जबकि ठीक उसी समय छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री ननकीराम कंवर बयान दे रहे थे कि ऑपरेशन ग्रीन हंट के दौरान 25 मार्च तक 90 माओवादी छत्तीसगढ़ में मारे गए हैं।

जब चिदंबरम की सेना आदिवासियों को मारने जाएगी तो क्या वे फूल माला लेकर स्वागत करेंगे? जाहिर है वे वही करेंगे जो उन्होंने दंतेवाड़ा में किया। फिर किस आधार पर इस कांड के लिए अब नक्सली ही जिम्मेदार हैं? क्या दंतेवाड़ा के लिए वह शख्स जिम्मेदार नहीं है जो एक दिन पहले ही पं बंगाल में कह रहा था कि नक्सली कायर हैं सामने क्यो नहीं आते? अब जब वे सामने आ गए तो चिदंबरम रोते क्यों हैं? और अब यह बात सामने भी आ गई है कि चिदंबरम की कारगुजारियों की खुद कांग्रेस के अंदर जबर्दस्त मुखालफत हो रही है।

इस घटना के तुरंत बाद चिदंबरम ने बयान दिया कि -‘ये माओवादी हैं जिन्होंने राज्य को ‘दुश्मन’ और संघर्ष को ‘युद्ध’ का नाम दिया है। हमने इस शब्द का कभी इस्तेमाल नहीं किया। ऐसे लोगों ने राज्य पर युद्ध थोपा है जिनके पास हथियार रखने और मारने का कानूनी अधिकार नहीं है।’ क्या कहना चाहते हैं हमारे गृह मंत्री? यही कि राज्य के पास हथियार रखने और निरीह आदिवासियों को मारने का कानूनी अधिकार है?

ताज्जुब यह है कि दुर्गा वाहिनी, बजरंग दल जैसे खूंखार कबीले बनाने वाला और दशहरे के रोज शस्त्र पूजन करने वाले उस आरएसएस ने भी जिसके पूर्वजों ने 15 अगस्त 1947 को बेमिसाल गद्दारी का दिन कहा था, दंतेवाड़ा कांड को भारत के लोकतांत्रिक सत्ता प्रतिष्ठान को माओवाद, नक्सलवाद की खुली चुनौती और माओवादियों को नृशंष हत्यारा बताया है।

दंतेवाड़ा कांड पर गुस्से का इजहार करने वाले यह सवाल क्यों नहीं पूछते कि सीआरपीएफ के यह जवान घटना स्थल के पास क्या करने गए थे जबकि वह स्थान ऑपरेशन के लिए चिन्हित नहीं था। अखबारों में आई रिपोर्ट्स बताती हैं कि गृह मंत्रालय के अधिकारी स्वयं इस बात पर हैरान हैं कि जब हमले वाला इलाका कार्रवाई के लिए चिन्हित केंद्रित जगहों में नहीं था तो इतनी संख्या में जवान जंगल के अंदर तक क्यों गए? इतना ही नहीं दंतेवाड़ा पर लानत-मलानत करने वाले मीडिया ने एक दिन पहले ही यह खबर क्यों नहीं दी कि जवान इस घटना से पहले आदिवासियों की एक बस्ती में गए थे और नक्सलियों की सर्च के नाम पर उन्होंने 26 महिलाओं के साथ बदसुलूकी की थी और एक महिला का हाथ भी तोड़ दिया था। यह खबर सिर्फ एक समाचार एजेंसी के द्वारा तब जारी की गई जब नक्सलियों ने दंतेवाड़ा को अंजाम दे दिया। जरा सवाल देश पर मर मिटने वाले सरकारी शहीदों के साथियों से भी पूछ लिया जाना चाहिए कि घटनास्थल से कुल चार किलोमीटर दूरी पर ही सीआरपीएफ का कैंप था लेकिन घटनास्थल पर कोई सहायता इस कैंप से क्यों नहीं पहुंचाई गई?

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Mar 25, '10




यह कैसा लोकतंत्र?


अमलेन्दु उपाध्याय



क्या हमारा साठ साला लोकतंत्र वाकई परिपक्व हुआ है या इसमें खामियां ही बढ़ी हैं? पिछले दिनों राज्यसभा से लेकर राज्यों की विधान सभाओं में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की सदन में हंगामे के बाद मार्षल कार्रवाई की तीन बड़ी घटनाओं ने यह सोचने पर मजबूर किया है। इन घटनाओं से लोकतंत्र षर्मसार हुआ है। बीती आठ और नौ मार्च को राज्यसभा में महिला आरक्षण बिल की प्रतियां फाड़ी गईं और सभापति के हाथ से भी कागज छीने गए, उसके बाद मार्षल कार्रवाई करके सात सांसदों को राज्यसभा से बाहर निकाला गया। इस घटना के कुछ दिन बाद ही कष्मीर विधानसभा में एक विधायक जी मार्षल की मदद से सदन से बाहर फिंकवाए गए और अब राजस्थान विधानसभा में विधायकों के उत्पात के बाद उनकी मार्षलों से मार- कुटाई की घटना से सारा देष हतप्रभ है।

राजस्थान विधान सभा में तो संसदीय आचरण की सारी सीमाएं लांघकर जिस तरह सदन को कुष्ती का अखाड़ा बनाया गया उससे चिंतित होना स्वाभाविक है। अभी तक ऐसी घटनाएं उत्तर प्रदेष और बिहार में तो आम समझी जाती रही हैं लेकिन राजस्थान जैसे अपेक्षाकृत षांत प्रदेष में यह घटना चैंकाने वाली है। उत्तर प्रदेष में तो पेपरवेट, माइक को भी हथियार बनाकर विधायकगण खूब लात-घूंसे चलाने के अभ्यस्त से हो चुके हैं। मुख्यमंत्री का विरोध करने के लिए विपक्षी दल के विधायक गुब्बारे लेकर सदन में अपना गुबार निकालते हैं, अध्यक्ष के आसन पर चढ़ जाते हैं और वेल में आ जाते हैं। वहां यह व्यवहार आम हो गया है और समाजवादी पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी के उदय के बाद उत्तर प्रदेष की राजनीति जिस तरह से मायावती बनाम मुलायम सिंह की व्यक्तिगत रंजिष में बदली है, उसको देखते हुए तो सदन को कुष्ती का अखाड़ा बनना लाजिमी है। हालांकि 16 दिसंबर 1993 को वहां की विधानसभा सपा और भाजपा विधायकों के बीच कुरूक्षेत्र का मैदान बनी उससे यह आभास हो गया था कि लोकतंत्र का क्षय हो रहा है।

यदि संसदीय आचरण की बात छोड़ भी दी जाए तो भी जनप्रतिनिधि सदन में इस प्रकार हंगामा करके सबसे ज्यादा अहित उस जनता का करते हैं जिसकी आवाज और समस्याएं उठाने के लिए वह चुनकर आए हैं। सदन की कार्रवाई प्रारंभ होते ही सबसे पहले प्रष्नकाल होता है, जो लोकतंत्र की जान है। लेकिन आष्चर्य है कि अधिकांष जनप्रतिनिधि प्रष्नकाल में ही उपस्थित नहीं रहते और यदि आते भी हैं तो किसी न किसी बहाने हो हल्ला मचाकर प्रष्नकाल को ही स्थगित करा देते हैं। इस प्रकार जहां जनता की बात सरकार तक नहीं पहुंच पाती वहीं सदन की कार्रवाई पर होने वाले खर्च का नुकसान भी आखिरकार 
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Mar 02, '10



^आजाद^आजाद*
उत्तर प्रदेश में 'लाल सलाम' कहना और सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध करना अब राष्ट्रद्रोही जुर्म है। कम से कम मानवाधिकार कार्यकर्ता और 'दस्तक' पत्रिका की संपादक और उनके पति पूर्व छात्रनेता विश्वविजय की गिरफ्तारी से तो ऐसा ही लगता है। देश भर के बुध्दिजीवी, कलाकार और साहित्यकार सीमा की गिरफ्तारी को लोकतंत्र की हत्या बता रहे हैं। उधर सरकार के जरूरत से ज्यादा काबिल पुलिस अफसर अपने बेतुके बयानों से घिरते जा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या सरकार की नीतियों का विरोध करना और लोगों को लामबंद करना अपराध है? सरकार के पास मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के इस सवाल का अभी तक कोई उत्तर नहीं है कि माओवाद, नक्सलवाद और आतंकवाद की परिभाषा क्या है
अमलेन्दु उपाध्याय 

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश की मानवाधिाकार कार्यकर्ता
सीमा आजाद और उनके पति विश्वविजय को पुलिस ने नक्सली बताकर इलाहाबाद में गिरफ्तार किया। यूपी पुलिस की इस कार्रवाई का पूरे देश में जबर्दस्त विरोधा हो रहा है। तमाम मानवाधिाकारवादी उत्तार प्रदेश सरकार के खिलाफ एकजुट होकर सवाल कर रहे हैं कि सरकार और पुलिस बताए कि माओवाद, नक्सलवाद और आतंकवाद में क्या अन्तर है और नक्सली साहित्य की परिभाषा क्या है। यह ऐसे सवाल हैं जिन पर यूपी के जाहिल पुलिस अफसर बचाव की मुद्रा में आ गए हैं।
बताते चलें कि सीमा आजाद मानवाधिाकार संस्था पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टिज (पीयूसीएल) से सम्बध्द हैं, साथ ही द्वैमासिक वैचारिक पत्रिका 'दस्तक' की सम्पादिका भी हैं। उनके पति विश्वविजय वामपंथी रुझान वाले जाने माने सामाजिक कार्यकर्ता और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र नेता हैं। सीमा लगातार 'दस्तक' में सरकार की जनविरोधाी नीतियों की मुखर आलोचना करती रही हैं। इतना ही नहीं सीमा ने 


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Feb 05, '10



अन्त अमरगाथा का
अमलेन्दु उपाध्याय
आखिरकार वह घड़ी आ ही गई जिसका समाजवादियों को चैदह वर्ष से इंतजार था। हालांकि चैदह वर्ष का वनवास तो मर्यादा पुरूषोत्तम राम ने भी भोगा था लेकिन समाजवादियों के लिए यह चैदह वर्ष किसी नर्क की यातना से कम नहीं थे। इन चैदह वर्षों में समाजवादी पार्टी दलालों, नर्तकियों और पूंजीपतियों का बसेरा बन गई थी और एक-एक करके सारे पुराने समाजवादी घर से बेघर कर दिए गए थे। कभी समाजवादी पार्टी के हैवीवेट महासचिव और प्रवक्ता रहे अमर सिंह लगभग एक महीने चले वाकयुद्ध के बाद पार्टी से निष्कासित कर दिए गए हैं। इस एक माह के दौरान अमर के कई रूप देखने को मिले। उन्होंने पार्टी नेतृत्व को धमकी देने के अंदाज में कहा था कि उनके सीने में मुलायम के कुछ राज दफन हैं। लेकिन उनकी धमकी का असर उल्टा ही पड़ा, बल्कि उनके निष्कासन से सपा में ऐसा उत्साहवर्धक माहौल है मानो कोई किला फतह किया गया हो। कल तक मुलायम सिंह की नाक का बाल रहे अमर सिंह आज समाजवादी पार्टी पर परिवारवाद का आरोप लगाकर उसकी जड़ों में मट्ठा डालने के लिए बेचैन दिख रहे हैं और ‘पर्दा जो उठ गया तो भेद खुल जाएगा’ की धमकी दे रहे हैं।
उधर अमर सिंह के सामने सवाल यह है कि वह किधर जाएं? शायद ही ऐसा कोई नेता रहा होगा जिसके लिए अमर सिंह ने कभी न कभी कुछ अपशब्दों का प्रयोग न किया हो। अमर ने पार्टी में परिवारवाद का आरोप लगाया लेकिन इससे वह स्वयं सवालों में घिर गए। अब वह भले ही कह रहे हों कि उन्हें राजनीति से मोक्ष मिल गया लेकिन असलियत यह है कि उन्होंने अपनी राजनीतिक पारी समाप्त करने की पटकथा स्वयं लिखी है
अमर सिंह आज के दिन एक टूटे हुए थके और निराश व्यक्ति हैं। भले ही वह कह रहे हों कि पिक्चर तो अभी बाकी है लेकिन उनके मस्तक की लकीरें बता रही हैं कि पिक्चर का ‘दि एंड’ हो चुका है, और शायद किसी भी गैर राजनीतिक व्यक्ति की राजनीति का अंत ऐसा ही होता है। राजनीति में अवसरवादिता का नतीजा शेयर मार्केट में भी दिखने लगा है। अमर सिंह भले ही मुलायम के राज न खोल पाएं लेकिन मुलायम के एक ही चरखा दांव से उनकी कंपनी ने शेयर धड़ाम से नीचे गिर गए हैं, जबकि सपा में नया जोश आ गया है। यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने इस अंत की पटकथा स्वयं अमर सिंह ने ही लिखी है ‘दूसरे को नहीं दोष गुसाईं।’
अमर सिंह का जो हश्र हुआ वह उस दिन ही तय हो गया था जिस दिन उन्होंने सपा का दामन थामा था और धीरे-धीरे अपने पूंजीपति आकाओं अनिल अंबानी, सुब्रत राय सहारा और फिल्मी नर्तकियों का प्रवेश राजनीति में कराना शुरू किया था। अमर सिंह डेढ़ दशक तक मुलायम सिंह की आंखों का तारा बने रहे और उनका जादू मुलायम के सिर इतना चढ़कर बोला कि एक समय में जनेश्वर मिश्र के निवास पर हुई सपा संसदीय दल की बैठक में जब मोहन सिंह ने यह सवाल पूछा कि उन्हें भी मालूम होना चाहिए कि पार्टी के बड़े फैसले कहां लिए जाते हैं, तो मुलायम ने अपने समाजवादी साथियों को ही यह कहकर हड़काया था कि वह बाहर के लोगों से बाद में लड़ेंगे पहले अपने घर के विद्रोह को ठीक करेंगे।
अमर सिंह ने बहुत तेजी के साथ सपा पर कब्जा किया और आखिर में स्थिति यह हो गई थी कि सपा के बड़े से बड़े नेता पहले अमर सिंह को साष्टांग प्रणाम करते थे और बाद में मुलायम से दुआ सलाम करते थे। अच्छी तरह से याद है जब अमर सिंह सपा में शामिल हुए थे तब राज बब्बर ने उन्हें मुलायम के घर का रास्ता दिखाया था। उस समय अमर सिंह ने मुलायम का शुक्रिया अदा करते हुए जो पोस्टर छपवाया था उसमें मुलायम के साथ-साथ जनेश्वर मिश्र, आजम खां, बेनी प्रसाद वर्मा, रामगोपाल यादव और राज बब्बर की जिन्दाबाद के नारे लिखे हुए थे। लेकिन बाद में उन्होंने राज बब्बर को न सिर्फ बाहर का रास्ता दिखवाया बल्कि कहा तो यहां तक जाता है कि एक बार तो राज बब्बर को पार्टी का टिकट तब मिला जब उन्होंने बाकायदा अमर से क्षमा याचना की। इसी तरह बेनी प्रसाद वर्मा और आजम खां भी बेइज्जत करके सपा से बाहर किए गए।
जिन रामगोपाल यादव पर अमर सिंह इतना फायर हो रहे हैं वह रामगोपाल भी एकबारगी पार्टी में इतने साइडलाइन हो गए थे कि उन्हें डिप्रेशन में अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था। फैजाबाद में हुए पार्टी के कार्यकर्ता सम्मेलन में अमर सिंह ने रामगोपाल पर कई तंज कसे थे। वहां से लौटते ही रामगोपाल जबरदस्त बीमार पड़़ गए। अब सवाल यह उठता है कि आखिर वह कौन से कारण थे कि इतना सिर चढ़ने के बाद अमर सिंह मुलायम परिवार के खिलाफ हो गए?
कहा जा रहा है कि अमर सिंह पार्टी में बढ़ते परिवारवाद से नाराज हो गए थे। यहां दो बात साफ कर दी जाएं। पहली तो यह कि अमर सिंह को यह समझने में चैदह साल क्यों लग गए कि सपा में परिवारवाद है? दूसरे परिवार की अहमियत वही व्यक्ति समझ सकता है जो पारिवारिक हो। एक निजी टीवी चैनल पर अमर सिंह ने स्वयं कहा कि वह अपने पिता से नाराज होकर अठारह वर्ष की आयु में घर से निकल गए थे और जब मृत्यु शैया पर पड़े उनके पिता ने उनसे पूछा कि क्या वह अभी भी उनसे नाराज हैं तो अमर ने कहा कि अगर उन्होंने( पिता ने) उन्हें डांटा न होता तो वह कामयाब आदमी न बन पाए होते। अमर सिंह के इस वक्तव्य से परिवार के प्रति उनकी घृणा की ग्रन्थि को समझा जा सकता है।
अमर की परेशानी तभी बढ़ना शुरू हुई जब मुलायम के पुत्र अखिलेश की आमद सक्रिय राजनीति में हुई। दरअसल अमर सिंह का ख्वाब था कि मुलायम सिंह केन्द्र की राजनीति में स्थापित होने के बाद उत्तर प्रदेश की बागडोर उन्हें सौंप देंगे। इसीलिए उन्होंने एक-एक करके अपने रास्ते के कांटे बेनी और आजम को रास्ते से हटाया। रामगोपाल और शिवपाल से उन्हें खतरा इसलिए नहीं था क्योंकि रामगोपाल मास लीडर नहीं हैं और गुणा भाग की राजनीति नहीं करते। जबकि शिवपाल सिर्फ मुलायम के हनुमान हैं और उनके अन्दर राजनीति में कुछ हासिल करने की तमन्ना भी नहीं है। ऐसे में उन्हें लगने लगा कि अखिलेश के आने से उनका खेल खराब हो गया है।
हालांकि अमर सिंह ने पहले मुलायम सिंह को अच्छी तरह समझा लिया था कि अखिलेश को सक्रिय राजनीति में न लाया जाए। जब सपा की युवा इकाई के बड़े नेता राकेश सिंह राना ने अखिलेश को आगे लाने का प्रस्ताव रखा था तो बताते हैं मुलायम ने राना को बुरी तरह डपट दिया था। लेकिन बाद में राना ने जब जनेश्वर मिश्र को समझाया कि ‘नेता जी’ के बाद पार्टी का क्या होगा और अगर अखिलेश को आगे नहीं लाया गया तो पार्टी असामाजिक तत्वों और पूंजीपतियों के दलालों की बंधक होकर अपना अस्तित्व खो देगी, तब जनेश्वर मिश्र को यह बात क्लिक कर गई और आॅस्ट्रेलिया से शिक्षा प्राप्त करके स्वदेश लौटे अखिलेश को समाजवाद की कमान सौंपने की तैयारी हुई। स्व ़ जनेश्वर मिश्र ने पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में इस पूरी घटना का उल्लेख भी किया था। इस प्रस्ताव से खफा अमर सिंह ने तीन बार राकेश राना का विधानसभा का टिकट कटवाया और दो बार विधान परिषद में नाम तय हो जाने के बाद उनका रास्ता रोक दिया। बाद में राना विधान परिषद के सदस्य तभी बन सके जब अमर सिंह संकट के बादलों से घिरना शुरू हुए।
लेकिन यह बात भी सही है कि फिरोजाबाद में मुलायम की पुत्रवधु डिंपल को चुनाव लड़वाने का फार्मूला भी अमर का ही था। इसके पीछे रणनीति यह थी कि अगर डिंपल हार जाएंगी तो यादव परिवार अपने आप बैकफुट पर आ जाएगा और अगर जीत जाएंगी तो परिवारवाद के आरोप लगना शुरू हो जाएंगे। लेकिन उनका यही दांव उनके लिए घातक साबित हुआ और यादव परिवार को उनका गुणा भाग समझ में आ गया। बाद में जो कुछ हुआ वह सारी दुनिया ने देखा।
इधर आजम खां प्रकरण से भी अमर सिंह को काफी झटका लगा। हालांकि वह आजम खां को बाहर का रास्ता तो दिखाने में कामयाब हो गए लेकिन आजम खां और मुलायम की मुलाकात में आजम खां ने जो दो-चार बातें मुलायम से कहीं उन्होंने भी अमर की विदाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सूत्रों का कहना है कि जब आजम खां मुलायम से कल्याण सिंह के मसले को लेकर मिले तो उन्होंने कहा था कि वह ( आजम) पठान हैं और जिस दिन उन्हें ( मुलायम को) छोडें़गे उस दिन राजनीति छोड़ देंगे। बाकी पार्टी उन्हें छोड़ती है तो यह उसका फैसला होगा। आजम ने अपना वादा निभाया, उन्होंने पार्टी नहीं छोड़ी पार्टी ने ही उन्हें छोड़ा। एक और बात जो आजम ने कही उस बात ने फिरोजाबाद की हार के बाद मुलायम को सोचने पर मजबूर कर दिया। बताते हैं आजम ने कहा- नेता जी पैसे तो कभी भी कमा लिए जाएंगे लेकिन अगर वोट एक बार चला गया तो फिर लौट कर नहीं आएगा। और फिरोजाबाद में जिस तरह से मुस्लिम वोट झड़कर राज बब्बर को मिला उससे आजम के शब्द मुलायम के कानों में गूंजने लगे।
जाहिर है ऐसे में अमर सिंह को परेशानी तो होनी ही थी। लेकिन अमर सिंह अपने ही बुने जाल में इस कदर फंसे कि बाहर जाकर ही रुके। अब अमर सिंह राजनीतिज्ञ तो हैं नहीं। वह बेसिकली एक ब्रोकर हैं लेकिन उन्हें गलतफहमी हो गई कि वह राजनेता हो गए हैं। उधर अपनी आदत के मुताबिक जब अमर ने मुलायम के राज अपने सीने में दबे होने का शोशा छोड़ा तो स्थिति बेकाबू हो गई और अमर के निष्कासन की फाइनल स्क्रिप्ट लिख दी गई।
हालांकि अमर सिंह ने पहले कांग्रेस में जाने के लिए अपने संपर्क टटोले लेकिन वहां से मनाही हो गई। फिर उन्होंने राष्ट्रवादी कांग्रेस में जाने की तैयारी की लेकिन तब तक वह मुलायम के खिलाफ इतना जहर उगल चुके थे कि शरद पवार ने उन्हें लेना उचित नहीं समझा। वह भाजपा में जा सकते थे लेकिन वहां उनके मित्र राजनाथ अब कमजोर हो गए हैं और भाजपा में जाकर वह मुलायम को नुकसान भी नहीं पहुंचा सकते थे। दूसरा, मुलायम सिंह से किसी के भी राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं, उनकी नीतियों से असहमति हो सकती है लेकिन यह शिकायत कोई नहीं कर सकता कि उन्होंने कभी आॅफ द रिकाॅर्ड भी अपने किसी विरोधी के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया हो। इसलिए जब अमर सिंह, मुलायम पर हमलावर हुए तो उनके लिए सिर्फ और सिर्फ बहुजन समाज पार्टी का ही रास्ता बचा था। लेकिन वहां दिक्कत यह है कि मायावती स्वयं अमर सिंह से ज्यादा अशिष्ट हैं और उन जैसों को वहां वह फ्री हैण्ड नहीं मिल सकता जैसा सपा में मिला। इसलिए मायावती, अमर सिंह का प्रयोग मुलायम के जयचंद और मीरजाफर की तरह तो कर सकती हैं लेकिन उन्हें सतीश चन्द्र मिश्र, नसीमुद्दीन या बाबू सिंह कुशवाहा का दर्जा नहीं दे सकती हैं। दूसरे अमर सिंह के विषय में अब कहा जाने लगा है कि वह जब मुलायम के नहीं हुए तो किसी और के कैसे हो जाएंगे?
इधर अमर सिंह के सपा तोड़ने के दावे की पोल खुल गई। जिन विधायकों को उनका खासमखास समझा जाता था वह भी उनके साथ नहीं आए। इसका कारण साफ है। इन विधायकों ने ताड़ लिया है कि अमर सिंह व्यापारियों के ब्रोकर हैं और किसी भी दिन कहीं भी चुपके से निकल जाएंगे और इन विधायकों के गले व्यक्तिगत दुश्मनियां बांध जाएंगे। इसीलिए अमर के सर्वाधिक विश्वासपात्र माने जाने वाले विधायक अरविन्द सिंह गोप भी उनके साथ नहीं आए और न राजा भैया या अक्षय प्रताप सिंह उर्फ गोपाल जी। जो अशोक सिंह चन्देल और संदीप अग्रवाल निकाले गए हैं वह मूल रूप से सपाई नहीं हैं बल्कि भाजपा और बसपा से सपा में आए थे। अबू आसिम आजमी, जिन्हें अमर सिंह अपना बता रहे थे, भी उनके साथ नहीं आए। सांसद राधामोहन सिंह खुद सपा मुखिया से मिलकर कह आए कि वह पार्टी के साथ हैं और अमर के साथ नहीं। रही बात जया प्रदा की तो वह भी आसमानी नेता हैं उनका उत्तर प्रदेश से कुछ लेना देना नहीं है।
अनिल अंबानी भी, जो अमर सिंह के मित्र कहे जाते हैं, खुलकर अमर सिंह के समर्थन में नहीं ही आए। क्योंकि वह भी अच्छी तरह जानते हैं कि एक पूंजीपति की औकात एक साधारण से राजनीतिज्ञ के सामने भी कुछ नहीं होती है। अगर कोई विश्वनाथ प्रताप सिंह सरीखा नेता किसी भूरेलाल जैसे अधिकारी को एक घंटे के लिए भी पीछे लगा देता है तो धीरूभाई अंबानी और नुस्ली वाडिया जैसे पूंजीपतियों को भी दिन में तारे नजर आ जाते हैं।
अमर सिंह को कहीं रास्ता न मिलने की एक प्रमुख वजह यह भी है कि उन जैसे तथाकथित मैनेजरों की किसी भी दल को फिलहाल जरूरत नहीं है। कांग्रेस के पास उनसे ज्यादा अच्छे मैनेजर मौजूद हैं जो सभ्य और सुसंस्कृत भी हैं। भाजपा में भले ही प्रमोद महाजन अब नहीं रहे लेकिन उनकी कमी दूर करने के लिए वहां भी बड़े-बड़े मैनेजर हैं। फिर अमर सिंह को कोई क्यों ले?







Jan 23, '10



अमलेन्दु उपाध्याय
हाल ही में प््राधानमंत्री के साथ एक भेंट में मंत्रिपरिशद के कुछ राज्य मंत्रियों ने षिकायत की कि तवज्जो नहीं मिलती है और केबिनेट मंत्री भाव नहीं देते हैं। इन राज्यमंत्रियों का का दर्द उभर कर सामने आया उनका कहना था कि वह लगभग बेरोजगार हैं और उनके पास फाइलें ही नहीं आती हैं। यह एक संगीन मामला है और दर्षाता है कि जब राज्यमंत्रियों का यह हाल है तब एक आम संासद की क्या स्थिति होगी? जाहिर है इस अप्रिय स्थिति के लिए स्वयं प्रधानमंत्री और उनके केबिनेट सहयोगी भी दोशी हैं। लेकिन यह तस्वीर का एकपक्षीय पहलू ही है और उस चष्मे से देखा गया अर्धसत्य है जिस पर राज्यमंत्रियों के षीषे चढ़े हुए हैं। तस्वीर का दूसरा पहलू भी है और यह पहलू इन राज्यमंत्रियों की दलील को अगर झुठलाता नहीं है तो कम से कम इस दलील पर सवाल तो उठाता ही है।
पहला सवाल यही है कि क्या केवल फाइल निपटाने से ही मंत्री जी का काम हो जाता है? फाइलें निपटाने के अलावा मंत्रियों के पास और कोई काम नहीं होता? फिर तो बहुत से ऐसे केबिनेट मंत्री भी हैं जिनके पास फाइलें कम ही होती हैं। क्या इसका तात्पर्य यह है कि उन मंत्रियों के पास काम नहीं है? जबकि कई मंत्री ऐसे भी हैं जिनके पास फाइलें तो कम ही होती हैं लेकिन महीनों वह फाइलें देख ही नहीं पाते। आखिर काम होने का पैमाना क्या है?
अभी ज्यादा समय नहीं बीता होगा जब गृह मंत्री पी चिदंबरम ने कहा था कि उनके ऊपर काम का इतना बोझ है कि उनके विभाग को दो हिस्सों में बांट देना चाहिए। ऐसे में क्या देष का आम आदमी यह जानता है कि चिदंबरम के अलावा गृह विभाग में राज्यमंत्री भी होते हैं? फिर इस स्थिति के लिए कौन दोशी है? क्या चिदंबरम भी अपने राज्यमंत्रियों को काम नहीं देते हैं। इसी तरह बहुत से सांसद ऐसे हैं जो मंत्री तो नहीं हैं लेकिन उनकी बात गम्भीरता से सुनी जाती है और सरकार तथा नौकरषाही को उनकी बात पर गौर करने की मजबूरी होती है। यह उन सांसदों की योग्यता की वजह से है। सरकार की बात छोड़ भी दीजिए तो विपक्ष में ही कई ऐसे सांसद ऐसे हैं जिनकी अपनी एक पहचान और आवाज है जबकि वह कभी मंत्री नहीं रहे। नीलोत्पल बसु, वृन्दा कारत, गुरदासदास गुप्ता, कलराज मिश्रा, दिग्विजय सिंह ऐसे ही सांसद हैं। स्वयं कांग्रेस में मनीश तिवारी, मीनाक्षी नटराजन और अषोक तंवर कुछ ऐसे नाम हैं जिनकी अपनी एक पहचान है और उनके पास काम की भी कोई कमी नहीं है क्योंकि वह अपने क्षेत्र में काम करते हैं और जनता के बीच रहते हैं। इसी तरह राज्यमंत्रियों में सीपी जोषी, जितिन प्रसाद को काम न होने के लिए रोना नहीं पड़ता।
इस बात को दो तीन उदाहरणों से समझा जा सकता है। मरहूम राजेष पायलट आन्तरिक सुरक्षा राज्य मंत्री थे। लेकिन षायद अपने समकालीन केबिनेट मंत्रियों से ज्यादा व्यस्त भी थे और उनकी देष में एक वाॅइस भी थी। पिछली यूपीए-वन सरकार में भी श्रीप्रकाष जायसवाल भी राज्यमंत्री ही थे लेकिन उन्होंने अपनी पहचान बनाई। जबकि लालकृश्ण अडवाणी के साथ आईडी स्वामी राज्यमंत्री थे उन्होंने भी अपनी पहचान बनाई। इन सभी के पास काम होने में उनके केबिनेट मंत्रियों का कोई रोल नहीं था।
अब अगर इन राज्यमंत्रियों का ‘काम’ से तात्पर्य ठेके, परमिट, कोटा लाइसेंस देने से है तब तो उनका दुखड़ा जायज हो सकता है कि केबिनेट मंत्री सारी मलाई खुद मार लेते हैं और उन्हें ( राज्यमंत्रियों ) कोई नहीं पूछता। तब तो वाकई प्रधानमंत्री को मलाई का सही अनुपात में बंटवारा करने की व्यवस्था करनी चाहिए।
इन राज्यमंत्रियों के एक दर्द से बिना किसी किंतु परंतु के सहमत हुआ जा सकता है कि राज्यमंत्रियों की बात को अधिकारी नहीं सुनते। लेकिन यह समस्या भी केवल राज्यमंत्रियों के साथ नहीं है। बल्कि इस मुल्क में अफसरषाही बहुत ताकतवर और बेलगाम है। अफसर केवल उस केबिनेट मंत्री की ही बात सुनते हैं जो या तो स्वयं तेज हो और सौ फीसदी राजनीतिज्ञ हो या फिर प्रधानमंत्री का नजदीकी हो और उनका कुछ बिगाड़ने की हैसियत रखता हो। वरना मंत्री जी खुद अपनी फाइलें ढूंढते रह जाते हैं और फाइलें सरकारी चाल से ही चलती हैं। इस स्थिति के लिए भी केवल अधिकारियों को दोशी नहीं ठहराया जा सकता। कारण बहुत साफ है। जब संसद में तीन सौ करोड़पति सांसद पहुंच गए तो जाहिर है कि यह तीन सौ सांसद व्यापारी पहले हैं और राजनीति इनके लिए दोयम दर्जे का काम है। ऐसे में क्या उम्मीद की जा सकती है कि अधिकारी इन सांसदों और ऐसे मंत्रियों की बात सुनेंगे? इसलिए बेहतर होगा कि यह राज्यमंत्रीगण अपना दुखड़ा राने के बजाए अपनी बात में असर पैदा करें और यह असर तभी पैदा होगा जब वह सौ फीसदी राजनीतिज्ञ बनेंगे वर्ना चाहे राज्यमंत्री बन जाएं या केबिनेट यह दुख दूर नहीं होगा।








Dec 16, '09



यूपी का विभाजन देश बांटने की पटकथा लिखेगा 

|| अमलेन्दु उपाध् याय || 

तेलंगाना राज्य बनाने की केन्द्र सरकार ने घोषणा क्या की पूरे देश में नए राज्य बनाने की पुरानी मांगों ने जोर पकड़ लिया। गोरखालैण्ड, बोडोलैण्ड, विदर्भ, हरित प्रदेश, बुन्देलखण्ड समेत लगभग दो दर्जन नए राज्य बनाए जाने की मांग सामने आ गई है। लगे हाथ उत्तार प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने भी प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने की मांग कर डाली है।

'राहुल बाबा और सोनिया' की कांग्रेस भी पहले से ही इस मांग का समर्थन करती रही है। आखिर मामला क्या है? सारा देश एकदम बंटने को क्यों तैयार है? तेलंगाना की घोषणा के साथ ही उत्तर प्रदेश के विभाजन की बहस फिर से शुरू होर् गई है। सन 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग कर उत्तरांचल बनाया गया था उसके बाद भी उत्तर प्रदेश के बचे हुए भूभाग से कम से कम तीन और राज्य बनाने की मांग उठ रही है। थोड़े समय पहले ही केंद्रीय गृहमंत्रालय ने स्वीकार किया था कि बिहार से मिथिलांचल, गुजरात से सौराष्ट्र और कर्नाटक से कूर्ग राज्य अलग बनाने सहित कम से कम दस नए प्रदेशों के गठन की मांग की गई है। जबकि कई ऐसे राज्यों की भी मांगें उठ रही हैं जो बमुश्किल दो या तीन जिलों के बराबर हैं और उनकी दिल्ली तक आवाज अभी सुनाई नहीं पड़ी है। जैसे पश्चिम उड़ीसा में कौशलांचल राज्य या फिर हरियाणा में मेवात प्रदेश की मांग उठ रही है।

यहां यह जिक्र करना उचित होगा कि पं. जवाहर लाल नेहरू भाषाई आधार पर राज्यों के गठन का विरोध करते रहे थे लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता पोट्टी श्रीरामालू की मद्रास से आंधा्र प्रदेश को अलग किए जाने की मांग को लेकर 58 दिन के आमरण अनशन के बाद मौत और संयुक्त मद्रास में कम्युनिस्ट पार्टियों के बढ़ते वर्चस्व ने उन्हें अलग तेलुगू भाषी राज्य बनाने पर मजबूर कर दिया था। 22 दिसंबर 1953 में न्यायाधीश फजल अली की अध्यक्षता में पहले राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन हुआ। इस आयोग ने 30 सितंबर 1955 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस आयोग के तीनं सदस्य-जस्टिस फजल अली, हृदयनाथ कुंजरू और केएम पाणिक्कर थे। 1955 में इस आयोग की रिपोर्ट आने के बाद ही 1956 में नए राज्यों का निर्माण हुआ और 14 राज्य व 6 केन्द्र शासित राज्य बने। फिर 1960 में पुनर्गठन का दूसरा दौर चला, जिसके परिणामस्वरूप 1960 में बंबई राज्य को तोड़कर महाराष्ट्र और गुजरात बनाए गए।

1966 में पंजाब का बंटवारा हुआ और हरियाणा और हिमाचल प्रदेश दो नए राज्यों का गठन हुआ। इसके बाद अनेक राज्यों में बंटवारे की मांग उठी लेकिन कांग्रेस ने अपने राजनीतिक हितों को धयान में रखकर बड़े राज्यों के विभाजन पर विचार किया और अपरिहार्य होने पर ही धीरे- धीरे इन्हें स्वीकार किया। फिर 1972 में मेघालय, मणिपुर, और त्रिपुरा बनाए गए। 1987 में मिजोरम का गठन किया गया और केन्द्र शासित राज्य अरूणाचल व गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया। आखिर में वर्ष 2000 में भाजपा की मेहरबानी से उत्ताराखण्ड, झारखण्ड और छत्ताीसगढ़ अस्तित्व में आए।
1950 के दशक में बने पहले राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश में राज्यों के बंटवारे का आधार भाषाई था। इसके पीछे तर्क दिया गया कि स्वतंत्रता आंदोलन में यह बात शिद्दत के साथ उठी थी कि जनतंत्र में प्रशासन को आम लोगों की भाषा में काम करना चाहिए ताकि प्रशासन लोगों के नजदीक आ सके। इसी वजह से तब भाषा के आधार पर राज्य बने। अगर उस समय भाषा आधार न होता और तेलंगाना या उत्ताराखण्ड जैसी दबाव की राजनीति काम कर रही होती तो संकट हो सकता था। लेकिन उस समय भी इस फार्मूले पर ईमानदारी से काम नहीं किया गया। उस समय भी दो राज्य बंबई जिसमें गुजराती व मराठी लोग थे तथा दूसरा पंजाब जहां पंजाबी-हिंदी और हिमाचली भाषी थे, नहीं बाँटे गए। आखिरकार इन्हें भी भाषाई आधार पर महाराष्ट्र व गुजरात तथा पंजाब, हिमाचल व हरियाणा में बांटना ही पड़ा।

लेकिन भाषा के आधाार पर राज्यों के गठन का फार्मूला पूर्ण और तार्किक आधार नहीं था। अगर भाषा ही आधाार था तो विदर्भ को महाराष्ट्र से उसी समय अलग क्यों नहीं किया गया? आंधा्र को उसी समय क्यों नहीं तोड़ा गया? या सारे हिन्दी भाषी राज्यों को मिलाकर एक राज्य क्यों नहीं बनाया गया? क्या सभी हिन्दी भाषी राज्यों को मिलाकर एक राज्य बना देने से विकास किया जा सकेगा?
छोटे प्रदेश की वकालत करने वालों का तर्क है कि जनसंख्या एवं क्षेत्रफल की दृष्टि से कई राज्यों के आकारों में बड़ी विषमता है। एक तरफ़ तो बीस करोड़ से भी अधिक आबादी वाले उत्तर प्रदेश जैसे भारी भरकम राज्य तो वहीं सिक्किम जैसे छोटे प्रदेश जिसकी जनसंख्या मात्र छ: लाख है। इसी तरह एक ओर राजस्थान जैसा लंबा चौडा राज्य जिसका क्षेत्रफल साढे तीन लाख वर्ग किमी है वहीं लक्षद्वीप मात्र 32 वर्ग किमी ही है । किंतु तथ्य बताते हैं कि छोटे प्रदेशों में विकास की दर कई गुना अधिक है।

उदाहरण के लिए बिहार की प्रति व्यक्ति आय आज मात्र 3835 रु है जबकि हिमाचल जैसे छोटे राज्य में यही 18750 रु है । तर्क दिया जा रहा है कि छोटे राज्य बनने के बाद आर्थिक प्रगति होती है। इसके लिए हरियाणा और हिमाचल का उदाहरण दिया जाता है। लेकिन यह तर्क मिथ्या है। अच्छे प्रशासन के लिए छोटे राज्य ठीक हो सकते हैं लेकिन ये ही विकास की एकमात्र गारंटी कैसे हो सकते है? हरियाणा को छोड़ दिया जाए तो झारखण्ड, उत्ताराखण्ड और छत्ताीसगढ़ के संबंधा में विकास और अच्छे प्रशासन की बातें बेमानी साबित हुई हैं। किसी भी राज्य की प्रगति के लिए राजनीतिक स्थिरता जरूरी है, मगर झारखंड में नौ साल में छह मुख्यमंत्री बदले गए और भ्रष्टाचार व सार्वजनिक धान की जिस तरह से लूट खसोट की गई वह यह तर्क झुठलाने के लिए काफी है। इसी तरह छत्ताीसगढ़ में नक्सलवाद और राज्य प्रायोजित आतंकवाद 'सलवां जुड़ूम' इसका उदाहरण हैं जबकि उत्ताराखण्ड नौ वर्षों में अपनी राजधाानी ही तय नहीं कर पाया है। मणिपुर नगालैंड मिजोरम जैसे छोटे राज्य भी राजनीतिक तौर पर लगातार अस्थिर बने रहे हैं।

फिर जिस तरीके से प्रांतीयता के सवाल पर महाराष्ट्र में राज ठाकरे का आतंक फैला और मधय प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बाहरी लोगों को लेकर जो भाषा प्रयोग की या दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित जिस तरह से अक्सर यूपी बिहार से आने वाले लोगों के लिए जहर उगलती रही हैं, वह संघीय गणतंत्र के स्वास्थ्य के लिए कोई शुभ संकेत नहीं है। ऐसे में छोटे राज्य क्षेत्रीय भावनाओं को भड़काने वाले और हमारे संञ्ीय ढांचे को तोड़ने वाले भी साबित हो सकते हैं।

जहां तक नए राज्यों की मांग का सवाल है तो काफी हद तक यह केन्द्र सरकार की आर्थिक नीतियों की विफलता का नतीजा हैं। क्योंकि पिछड़े क्षेत्रों के लोगों को लगता है कि उनके साथ भाषा जाति, या क्षेत्र के नाम पर भेदभाव किया जा रहा है और नया राज्य बन जाने से उनका विकास होगा। असम से पृथक् किए गए नगालैंड, मणिपुर मिजोरम हों या मेञलय सभी छोटे हैं और सबकी अलग-अलग किस्म की जनजातीय आबादी और पहचान है। उनका असम के साथ रहना मुश्किल होता गया इसलिए इन्हें अलग राज्य बनाया गया। लेकिन क्या इन राज्यों का विकास हो पाया?

नए राज्यों की मांग के पीछे असल कारण राजनीतिक दलों व नेताओं की क्षेत्रीय राजनीतिक डॉन और मुख्यमंत्री बनने की इच्छा है। फिर ऐसी मांग करने वाले चाहे चौधारी अजित सिंह हों या मायावती। उत्तार प्रदेश को विभाजित करके हरित प्रदेश बनाए जाने की मांग कर रहे राष्ट्रीय लोकदल के नेता चौधारी अजित सिंह का सपना प्रदेश का मुख्यमंत्री बनना रहा है जिसके लिए उन्होंने कई अतार्किक समझौते भी किए हैं और कला बाजियां भी खाई हैं। उन्हें लगता है कि उत्तार प्रदेश के एक रहते वह जिंदगी भर मुख्यमंत्री नहीं बन सकते इसलिए हरित प्रदेश बन जाना चाहिए। तेलंगाना बुंदेलखंड हो या फिर हरित प्रदेश नए छोटे राज्यों की ऐसी तमाम मांगें जोर पकड़ रही हैं। इनके पीछे सामाजिक और आर्थिक और प्रशासनिक कारण तो हो सकते हैं लेकिन मुख्य कारण राजनीतिक ही हैे। स्वयं उत्तर प्रदेश कांग्रेस अधयक्ष रीता जोशी के इस कथन कि ' पहले मुलायम और अब मायावती उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य का प्रशासन चलाने में असमर्थ हैं। इसीलिए बुंदेलखंड सहित राज्य के दूसरे हिस्सों (पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वान्चल) के लोग अलग प्रदेश की मांग कर रहे हैं।' से नए राज्यों की मांग के पीछे छिपा राजनीतिज्ञों का दर्द समझा जा सकता है।

कांग्रेस समझती है कि उत्तार प्रदेश के एक रहते वह वहां कभी अब पूर्ण बहुमत में नहीं आ सकती इसलिए प्रदेश तोड़ दिया जाए। यही कारण है कि अब केन्द्रीय राज्यमंत्री और हाल ही तक झांसी के विधायक प्रदीप जैन 'आदित्य' ने राज्य विधानसभा में पृथक बुंदेलखंड बनाने का प्रस्ताव रखा। मायावती भी इसी डर में यूपी के चार हिस्से चाहती हैं। उन्हें लगता है कि अगर पश्चिमी उ.प्र. अलग राज्य अन जाए तो वहां पच्चीस प्रतिशत दलित मतों के सहारे वह जिन्दगी भर मुख्यमंत्री बनी रह सकती हैं।

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बांदा चित्रकूट झांसी ललितपुर और सागर जिले को मिलाकर बुंदेलखंड राज्य बनाने की मांग उठती रही है। कांग्रेस भी इस की आग पर अपनी रोटियां सेंकती रही है। राहुल गांधाी ने बुन्देलखण्ड को जो स्पेशल आर्थिक पैकेज दिलवाया उसके पीछे विकास नहीं बल्कि कांग्रेस को पुनर्जीवित करने की राजनीति है। इसी लालच में मायावती भी उ.प्र. को तोड़ने की बात कर रही हैं। क्योंकि उन्हें भी लगता है कि उ.प्र. बंट गया तो वह जिन्दगी भर मुख्यमंत्री बनी रहेंगी।

पहले पुनर्गठन आयोग ने यूपी के विभाजन के खिलाफ राय जताई थी तथा पं. नेहरू व गोविंद वल्लभ पंत भी उसके तर्को से सहमत थे। दिल्ली के प्रथम मुख्यमंत्री चौधारी ब्रह्म सिंह दिल्ली, हरियाणा, पश्चिमी उत्तार प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्सों को मिलाकर 'वृहत्तार दिल्ली' बनाए जाने के पक्षधार थे। उनकी सोच थी कि यह जाट प्रदेश बन जाए तो उनकी पांचों ऊंगलियां घी में रहेंगी। उनका पं गोबिन्द वल्लभ पंत ने जोरदार विरोधा किया था। समय के साथ साथ यह मांग पीछे चली गई।

नए राज्यों के पुनर्गठन के लिए सुझाव देते वक्त 'राज्य पुनर्गठन आयोग' ने ही कई विवादों को जन्म दे दिया। आयोग की राय के खिलाफ जाकर उत्तर प्रदेश के टुकड़े कर छोटे राज्य बनाने का सुझाव फजल अली आयोग के सदस्य सरदार केएम पणिक्कर ने ही दिया था। उत्तर प्रदेश के बंटवारे के वह पहले प्रस्तावक थे। अपने प्रसिध्द असम्मति-पत्र, में पणिक्कर ने उत्तर प्रदेश को अंविभाजित रखने के आयोग के फैसले से असहमति जताते हुए देश की कुल आबादी के छठे भाग को एक ही राज्य में रखने को नासमझी करार दिया था।? अब उनकी इस टिप्पणी को आधाार बनाकर शासन कर पाने में असमर्थ नाकारा राजनेता उत्तार प्रदेश को बांटने की सिफारिश कर रहे हैं। उधार पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों को मिलाकर 'भोजपुर' राज्य बनाने की मांग भी की जा रही है जबकि मिथिला भाषी हिस्से को 'मिथिलांचल 'राज्य बनाने की मांग भी हो रही है।

गोरखा जनमुक्ति मोर्चा जीजेएम पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग और आसपास के क्षेत्रों को मिलाकर गोरखालैण्ड बनाने की मांग कर रहा है और भाजपा इसका समर्थन कर रही है। भाजपा का सोचना है कि गोरखालैण्ड बन जाने से उसकी ताकत में थोड़ा इजाफा हो जाएगा क्योंकि जीजेएम के सहयोग से ही पं बंगाल के रास्ते लोकसभा में पहुंचने का उसका खाता पहली बार खुला है।

पश्चिम बंगाल और असम के क्षेत्रों को मिलाकर 'वृहद कूच बिहार' बनाए जाने की मांग उठती रही है। पं. बंगाल के ही उत्तारी जिलों को मिलाकर 'कामतापुर राज्य' बनाए जाने की मांग भी उठ रही है। तो असम के कछार, हैलाकांडी, और करीम गंज सहित कुछ जिलों को मिलाकर बराक घाटी राज्य की मांग भी उठती रहती है। जबकि बोडोलैण्ड की मांग तो काफी हिंसक रूख अख्तयार कर चुकी है।

मध्य प्रदेश में भी कई राज्य बनाए जाने की मांग की जा रही है। 'गोंडवाना' क्षेत्र को अलग करके गोंडवाना राज्य की मांग की जा रही है तो महाकोशल क्षेत्र को अलग करके 'महाकोशल* राज्य बनाए जाने की मांग भी की जा रही है।

इतना ही नहीं उत्तार प्रदेश, राजस्थान और मध्यप्रदेश के कुछ जिलों को मिलाकर 'चंबल राज्य' बनाए जाने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू हो चुका है। राजस्थान में भी 'मरू प्रदेश' और 'मेवाड़' की मांग यदा-कदा उठती रहती है। ताजा मांग उदयपुर में हाईकोर्ट बेंच के बहाने 'मेवाड़' प्रदेश की है जिसे भाजपा नेता किरण माहेश्वरी हवा दे रही हैं।

आंधा्र प्रदेश में ही तेलंगाना के अलावा तटीय जिलों को मिलाकर रायलसीमा और काकतीय राज्य की मांग भी जोर पकड़ रही है। महाराष्ट्र में विदर्भ की अलग राज्य की मांग बहुत पुरानी है। जबकि इसके बरार क्षेत्र को भी अलग राज्य की मांग की जाती रही है। गुजरात से सौराष्ट्र राज्य अलग बनाने की है जो पिछले कई वर्ष से गृह मंत्रालय के समक्ष लंबित है।

कुल मिलाकर नए राज्यों की मांग विशुध्द राजनीतिक है और इसका विकास या अच्छे प्रशासन से कोई लेना देना नहीं है। प्रदेशों को बांटने की मुहिम क्या देश तोड़ने की मंजिल पर जाकर रूकेगी? खासतौर पर उ.प्र. बंटा तो मुल्क बंटने की पटकथा लिखी जाएगी। 
  








Dec 01, '09



भाजपा को नहीं मिलेगा लिब्राहन की रिपोर्ट का लाभ
भाजपा को नहीं मिलेगा लिब्राहन की रिपोर्ट का लाभ





अमलेन्दु उपाध्याय



आखिरकार सरकार को लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट संसद के पटल पर रखने को विवश होना ही पड़ा। और यह रिपोर्ट पेश होते ही इसका फायदा उठाने के लिए सियासी कुश्ती शुरू भी हो गई है। समझा जा रहा है कि यह रिपोर्ट डूबती भाजपा के लिए संजीवनी का काम करेगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या भाजपा को इस रिपोर्ट के आने से कोई फायदा मिलेगा? लगता तो नहीं है।






प्रथम दृष्टया तो यह सरकार की तरफ से चला गया दांव ही लग रहा है। भले ही रिपोर्ट लीक मामले पर गृहमंत्री पी चिदंबरम यह आश्वासन दें कि गृह मंत्रालय से किसी ने भी इस बारे में किसी से बातचीत नहीं की है और इसकी एक ही प्रति है और वह पूरी हिफाजत से रखी गई है। लेकिन समझने वाले समझते हैं कि कहीं न कहीं इस रिपोर्ट लीक के पीछे हाथ कांग्रेस और केंद्र सरकार का ही है। क्योंकि बाबरी मस्जिद (ढांचा नहीं मस्जिद ही पढ़ा जाए) को शहीद किया जाना कोई छोटी मोटीे घटना नहीं थी। 6 दिसंबर 1992 स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसा मोड़ था जिसने भारतीय राजनीति की दिशा ही बदल दी। तब ऐसे मौके पर कांग्रेस भला क्यों भाजपा को इस रिपोर्ट का फायदा उठानें देना चाहेगी? वैसे भी सत्रह साल बाद लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट का कोई बहुत मतलब नहीं रह जाता.






जहां तक मस्जिद विध्वंस के दोषियों का सवाल है तो आज अपनी रिपोर्ट में अगर लिब्राहन ने किसी राजनीतिक व्यक्ति को इस ञ्टना के लिए षडयंत्र का दोषी माना भी है तो अब इससे क्या होगा? जितने लोगों की गवाही इस आयोग के सामने हुई है और जिन 68 को आयोग ने दोषी ठहराया है, उनमें से अधिकांश लोगों पर रायबरेली की कोर्ट में मुकदमा पहले से ही चल रहा है. फिर किसी एक ञ्टना में एक ही व्यक्ति पर दो मुकदमें नहीं चलाए जा सकते. रायबरेली की अदालत से कोई फैसला आने के बाद ही उस पर आगे की कार्रवाई तय होगी. जबकि इनमें से कई अब अल्लाह मियां को प्यारे हो चुके हैं।






इसलिए इस रिपोर्ट का कोई कानूनी मतलब नहीं रह गया है हां इसके राजनीतिक निहितार्थ जरूर हैं और उन्हें पूरा करने के लिए ही भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस में युध्द छिड़ा है।


हां सवाल है कि लिब्राहन आयोग का प्रतिवेदन केंद्र सरकार और स्वयं आयोग के पास था। यह प्रतिवेदन कार्रवाई रिपोर्ट के साथ संसद में पेश किया जाना चाहिए था, लेकिन इससे पहले ही यह मीडिया को लीक कैसे हो गया? अब अगर चिदंबरम सच बोल रहे हैं कि सरकार ने यह रिपोर्ट लीक नहीं की है तो किसने की? क्या गश्ह मंत्री का इशारा जस्टिस लिब्राहन की तरफ है? तो सरकार उनके खिलाफ क्या कदम उठाएगी? यह मामला इसलिए भी गम्भीर है कि संसद का सत्र चल रहा है और जो रिपोर्ट इस सत्र में पेश की जानी थी उसका मीडिया में लीक हो जाना संसद की तौहीन है और जाहिर है कि इस तौहीन का इल्जाम सरकार पर ही आयद होता है। जस्टिस लिब्रहान के विषय में आम धाारण्ाा है कि वह बहुत ईमानदार हैं और रिपोर्ट लीक करने जैसा घटिया काम कतई नहीं कर सकते। अखबार ने भी 'गश्ह मंत्रालय के सूत्रों' का उल्लेख किया है। इसलिए संदेह के घेरे में तो चिदंबरम का मंत्रालय ही है।






फिर सवाल यह है कि इस रिपोर्ट के समय से पहले लीक होने से फायदा किसे है? जाहिर है कि जबर्दस्त अंदरूनी कलह से जूझ रही भाजपा इस रिपोर्ट का कुछ भी फायदा लेने की स्थिति में नहीं है। ऐसा नहीं है कि वह इसका फायदा लेना नहीं चाहती लेकिन ऐसा अवसर फिलहाल तो उसके पास नहीं है। हालांकि अडवाणी जी इसका व्यक्तिगत फायदा उठाना चाहते हैं जैसा उनके लोकसभा में भाषण से स्पष्ट भी हो गया लेकिन क्या भाजपा इसका फायदा उन्हें उठाने देगी? हालांकि उदार दिखने की चाहत में अडवाणी जी आयोग के सामने जो बयान दे बैठे थे वह उन्हें इसका लाभ लेने से रोकेगा, जिसमें उन्होंने कहा था कि बाबरी मस्जिद तोड़े जाने का दिन उनकी जिंदगी का सबसे दुखदाई दिन था। उन्होंने इस ञ्टना की तुलना 1984 के सिख विरोधी दंगों से करते हुए आयोग से कहा था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के दंगे में सिखों के खिलाफ भड़की हिंसा 6 दिसंबर से ज्यादा शर्मनाक थी। अब किस मुंह से अडवाणी इसका लाभ उठा पाएंगे?






वैसे यह रिपोर्ट भाजपा के लिए एक सुनहरा अवसर साबित हो सकती थी लेकिन सत्ताा के लालच में वह यह अवसर स्वयं गंवा चुकी है। उसकी राम मंदिर की काठ की हांडी एक नहीं तीन तीन बार आग पर चढ़ चुकी है और अब चढ़ने से रही। भाजपा अपनी असल सूरत छिपाने के चक्कर में लगातार ऊहापोह की शिकार रही है। एक तरफ अटल अडवाणी की मंडली लगातार 6 दिसंबर 1992 के लिए माफी भी माँगती रही है और दूसरी तरफ भाजपा 6 दिसंबर को शौर्य दिवस भी मनाती रही है। आखिर बाबरी मस्जिद शहीद किए जाने की जिम्मेदारी स्वीकार करने से भाजपा शरमाती क्यों रही है? और अगर यह काम उसने नहीं किया था तो हर 6 दिसंबर को शौर्य किस बात का?






भाजपा को इस प्रकरण का कोई लाभ न मिल पाने का एक महत्वपूर्ण कारण है। भाजपा अभी तक इसी उधोड़बुन में है कि अडवाणी जी को अपना नेता माने या न माने। पिछले एक वर्ष में जिस तरह से अडवाणी जी के ऊपर संघ परिवार ने हमले किए हैं वह भाजपा की अंदरूनी कलह को उजागर करते हैं। भाजपा को इस रिपोर्ट का फायदा मिल भी सकता था अगर उसके सेनापति अडवाणी जी बने रहें। लेकिन अडवाणी जी से तख्त-औ-ताज और उनका चैन-औ-करार छीनने को बेताब राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, अरूण जेटली वैंकेया नायडू और गडकरी की कंपनी क्या ऐसा होने देगी? भाजपा की सैकेण्ड लाइन लीडरशिप बहुत जल्दी में है। अगर अडवाणी जी दो चार साल ही और टिक गए तो उसके तो सारे अरमानों पर पानी फिर जाएगा। इसलिए यह मंडली कभी नहीं चाहेगी कि अडवाणी जी को इसका कोई फायदा व्यक्तिगत रूप से मिले और जब तक अडवाणी जी को इसका लाभ नहीं मिलेगा तब तक भाजपा को भी इसका कोई लाभ मिलने से रहा।






फिर भाजपा अटल और अडवाणी के बाद कोई भी गंभीर और हद दर्जे का चतुर नेता पैदा नहीं कर पाई है जो कारगिल में हुई अपनी थुक्का फजीहत को भी 'विजय' के रूप में कैश कर सके और खूंखार आतंकवादियों की दामाद की तरह खातिरदारी कर कंधाार छोड़ आने के बाद भी अडवाणी जी को 'लौह पुरूष' की तरह प्रोजेक्ट कर सके।






इसके अलावा भी भाजपा की समस्याएं कम नहीं है। हर सांप्रदायिक और कट्टर आंदोलन का उभार एक निश्चित समय के लिए होता है उसके बाद उसका पराभव होता है। राम मंदिर आंदोलन के बहाने भाजपा ने जिस सांप्रदायिक और फासीवादी उभार को पाला पोसा था उसका गुब्बारा 6 दिसंबर 1992 के साथ ही फूटा और उसकी सारी हवा उस दिन निकल गई जब भाजपा ने सत्ता में आने के लिए राम मंदिर, धाारा 370 और यूनिफॉर्म सिविल कोड जैसे मुद्दों को छोड़ा। उग्र हिंदू तबके में उसकी विश्वसनीयता उसके इस कृत्य से घट गई। अब अगर लिब्रहान के बहाने भाजपा ऊंगली कटाकर शहीद होने का नाटक करती भी है तो भी यह उग्र हिंदू तबका उसके हाथ आने से रहा।






दूसरे इन सत्रह सालों में गंगा में बहुत पानी बह चुका है। सबसे बड़ी बात यह है कि पिछले डेढ़ दशक में भारत का आर्थिक परिदृश्य बड़ी तेजी से बदला है। उदारीकरण और वैश्वीकरण के आने के बाद वह मधय वर्ग जो भाजपा का हिमायती समझा जाता है उसकी एक नई पीढ़ी तैयार हो चुकी है। यह नई पीढ़ी सांप्रदायिक तो है पर है शुध्द व्यावसायिक और पेशेवर। पेप्सी, कोला, पिज्जा बर्गर और मिनरल वाटर पर पलने वाली यह पीढ़ी दंगों से अपने आर्थिक हितों पर होने वाली चोट को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। जबकि भाजपा समेत हर फासीवादी सांप्रदायिक उभार के लिए दंगे अनिवार्य शर्त हैं। इसका गंभीर पहलू यह भी है कि इस आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण को भाजपा ने भी कांग्रेस के साथ साथ पाला पोसा है।






हालांकि भाजपा ने इस रिपोर्ट का लाभ उठाने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। राज्यसभा में जिस तरह से एसएस अहलूवालिया और भाजपा के परम मित्र और कल तक कल्याण सिंह के परम सखा रहे और कल्याण सिंह की तुलना जनाब-ए- हुर से करने वाले अमर सिंह में जिस तरह नूरा कुश्ती हुई उससे संकेत मिल गया है कि भाजपा अब मुलायम सिंह की मदद से इस मुद्दे पर देश के सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने का प्रयास करेगी। ताज्जुब इस बात का है कि मुलायम सिंह के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी जो लगातार बाबरी मस्जिद की कमाई खाती रही है, इस मुद्दे पर चुप लगा गई थी क्यों कि तब कल्याण सिंह उसके साझीदार हो गए थे और मुलायम सिंह ने तो यहां तक कह दिया था कि बाबरी मस्जिद का मुद्दा अब पुराना पड़ गया है। लेकिन अब फिर सपा को भी इस रिपोर्ट के बहाने बाबरी मस्जिद याद आने लगी है।






कुल मिलाकर कांग्रेस ने इस रिपोर्ट को सही वक्त पर लीक कराकर एक बार फिर बाजी मार ली दिखती है। क्योंकि हाल फिलहाल में कहीं चुनाव भी नहीं होना है और लोकसभा चुनाव भी दूर हैं। और अगर यह रिपोर्ट ऐसे समय लीक होती जब संसद सत्र नहीं चल रहा होता तो जो हंगामा भाजपा अपनी मित्र समाजवादी पार्टी के साथ सदन में कर रही है तब सड़कों पर कर रही होती। साथ ही अभी भाजपा इसी उलझन में फंसी हुई है कि अडवाण्ाी जी को अपना नेता माने या न माने और अगर इसका कुछ फायदा अडवाणी जी के खाते में जाता भी है तो उससे भाजपा को कोई लाभ नहीं होना है। दूसरी तरफ उत्तार प्रदेश जहां कांग्रेस इस समय चौतरफा लड़ाई लड़ रही है वहां उसे फायदा होगा क्योंकि वह मुलायम सिंह जो कल तक कह रहे थे कि बाबरी मस्जिद विधवंस मामले में कल्याण सिंह दोषी नहीं हैं वह अब किस मुंह से लिब्राहन की रिपोर्ट पर हाय तौबा मचाएंगे? अब कांग्रेस के पास उन्हें उत्तार प्रदेश में घेरने का आधाार होगा। वैसे भी अब मुलायम सिंह के सारे पुराने साथी साथ छोडत्र चुके हैं और दलालों को जनता जानती है।






उधार कल्याण सिंह भी जो अभी कुछ दिन पहले ही छह दिसंबर 1992 के लिए मुसलमानों से माफी मांग रहे थे तुरंत हिन्दू हो गए हैं और जोर शोर से अपने शहीद होने का बखान कर रहे हैं॥ बाबरी मस्जिद तोड़े जाने के समय कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। हालांकि वे लिब्राहन कमीशन के सामने पेश होने से ग्यारह साल तक बचते रहे। उन्होंने इसके खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर करके कहा था कि आयोग के सामने पेश होने पर सीबीआई कोर्ट में उनके खिलाफ चल रहे मुकदमे पर प्रभाव पड़ेगा। पर कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी तो उन्हें गवाही देने पेश होना पड़ा। तब उन्होंने दावा किया था कि उनकी सरकार ने बाबरी मस्जिद को बचाने के पूरे इंतजाम किए थे लेकिन केंद्र की कांग्रेस सरकार ने ऐसी परिस्थिति तैयार की जिससे मस्जिद टूटी।




हालांकि दिक्कतें कांग्रेस के सामने भी हैं। ऐसे में लगता नहीं कि कांग्रेस ईमानदारी से इस रिपोर्ट पर कार्रवाई करेगी? क्योंकि सवाल तो कांग्रेस से भी होंगे ही। सरकार ने जो एटीआर प्रस्तुत की है उससे उसकी मंशा जाहिर हो गई है। नरसिंहा राव ने आयोग को दिए अपने बयान में कहा था कि 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार के हाथ बंधक बन गई थी। अयोध्या में कारसेवकों की भीड़ बढ़ने के साथ-साथ हालात खराब होते गए। उन्होंने सफाई दी थी कि केंद्र सरकार के हाथ बंधे हुए थे। राव ने कहा था कि इतिहास उनके साथ न्याय करेगा। लेकिन सवाल यह है कि यह न्याय कैसा होगा जब उनकी पार्टी ही अब उनका नाम लेने से कतराती है?






मानना पड़ेगा चिदंबरम भाजपा के नेताओं के मुकाबले कहीं अधिाक चतुर सुजान हैं जिन्होंने एक छोटी सी चाल चलकर भाजपा समेत अपने सारे विरोधिायों को चित्ता कर दिया है। आयोग की रिपोर्ट लीक होने से कांग्रेस को सीधा राजनीतिक फायदा मिलेगा वहीं भाजपा को इस रिपोर्ट से अब कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि अब वह अपनी सारी ऊर्जा इस बात पर खर्च कर देगी कि रिपोर्ट लीक कैसे हुई? 

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