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Mar 02, '10



^आजाद^आजाद*
उत्तर प्रदेश में 'लाल सलाम' कहना और सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध करना अब राष्ट्रद्रोही जुर्म है। कम से कम मानवाधिकार कार्यकर्ता और 'दस्तक' पत्रिका की संपादक और उनके पति पूर्व छात्रनेता विश्वविजय की गिरफ्तारी से तो ऐसा ही लगता है। देश भर के बुध्दिजीवी, कलाकार और साहित्यकार सीमा की गिरफ्तारी को लोकतंत्र की हत्या बता रहे हैं। उधर सरकार के जरूरत से ज्यादा काबिल पुलिस अफसर अपने बेतुके बयानों से घिरते जा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या सरकार की नीतियों का विरोध करना और लोगों को लामबंद करना अपराध है? सरकार के पास मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के इस सवाल का अभी तक कोई उत्तर नहीं है कि माओवाद, नक्सलवाद और आतंकवाद की परिभाषा क्या है
अमलेन्दु उपाध्याय 

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश की मानवाधिाकार कार्यकर्ता
सीमा आजाद और उनके पति विश्वविजय को पुलिस ने नक्सली बताकर इलाहाबाद में गिरफ्तार किया। यूपी पुलिस की इस कार्रवाई का पूरे देश में जबर्दस्त विरोधा हो रहा है। तमाम मानवाधिाकारवादी उत्तार प्रदेश सरकार के खिलाफ एकजुट होकर सवाल कर रहे हैं कि सरकार और पुलिस बताए कि माओवाद, नक्सलवाद और आतंकवाद में क्या अन्तर है और नक्सली साहित्य की परिभाषा क्या है। यह ऐसे सवाल हैं जिन पर यूपी के जाहिल पुलिस अफसर बचाव की मुद्रा में आ गए हैं।
बताते चलें कि सीमा आजाद मानवाधिाकार संस्था पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टिज (पीयूसीएल) से सम्बध्द हैं, साथ ही द्वैमासिक वैचारिक पत्रिका 'दस्तक' की सम्पादिका भी हैं। उनके पति विश्वविजय वामपंथी रुझान वाले जाने माने सामाजिक कार्यकर्ता और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र नेता हैं। सीमा लगातार 'दस्तक' में सरकार की जनविरोधाी नीतियों की मुखर आलोचना करती रही हैं। इतना ही नहीं सीमा ने 


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Feb 05, '10



अन्त अमरगाथा का
अमलेन्दु उपाध्याय
आखिरकार वह घड़ी आ ही गई जिसका समाजवादियों को चैदह वर्ष से इंतजार था। हालांकि चैदह वर्ष का वनवास तो मर्यादा पुरूषोत्तम राम ने भी भोगा था लेकिन समाजवादियों के लिए यह चैदह वर्ष किसी नर्क की यातना से कम नहीं थे। इन चैदह वर्षों में समाजवादी पार्टी दलालों, नर्तकियों और पूंजीपतियों का बसेरा बन गई थी और एक-एक करके सारे पुराने समाजवादी घर से बेघर कर दिए गए थे। कभी समाजवादी पार्टी के हैवीवेट महासचिव और प्रवक्ता रहे अमर सिंह लगभग एक महीने चले वाकयुद्ध के बाद पार्टी से निष्कासित कर दिए गए हैं। इस एक माह के दौरान अमर के कई रूप देखने को मिले। उन्होंने पार्टी नेतृत्व को धमकी देने के अंदाज में कहा था कि उनके सीने में मुलायम के कुछ राज दफन हैं। लेकिन उनकी धमकी का असर उल्टा ही पड़ा, बल्कि उनके निष्कासन से सपा में ऐसा उत्साहवर्धक माहौल है मानो कोई किला फतह किया गया हो। कल तक मुलायम सिंह की नाक का बाल रहे अमर सिंह आज समाजवादी पार्टी पर परिवारवाद का आरोप लगाकर उसकी जड़ों में मट्ठा डालने के लिए बेचैन दिख रहे हैं और ‘पर्दा जो उठ गया तो भेद खुल जाएगा’ की धमकी दे रहे हैं।
उधर अमर सिंह के सामने सवाल यह है कि वह किधर जाएं? शायद ही ऐसा कोई नेता रहा होगा जिसके लिए अमर सिंह ने कभी न कभी कुछ अपशब्दों का प्रयोग न किया हो। अमर ने पार्टी में परिवारवाद का आरोप लगाया लेकिन इससे वह स्वयं सवालों में घिर गए। अब वह भले ही कह रहे हों कि उन्हें राजनीति से मोक्ष मिल गया लेकिन असलियत यह है कि उन्होंने अपनी राजनीतिक पारी समाप्त करने की पटकथा स्वयं लिखी है
अमर सिंह आज के दिन एक टूटे हुए थके और निराश व्यक्ति हैं। भले ही वह कह रहे हों कि पिक्चर तो अभी बाकी है लेकिन उनके मस्तक की लकीरें बता रही हैं कि पिक्चर का ‘दि एंड’ हो चुका है, और शायद किसी भी गैर राजनीतिक व्यक्ति की राजनीति का अंत ऐसा ही होता है। राजनीति में अवसरवादिता का नतीजा शेयर मार्केट में भी दिखने लगा है। अमर सिंह भले ही मुलायम के राज न खोल पाएं लेकिन मुलायम के एक ही चरखा दांव से उनकी कंपनी ने शेयर धड़ाम से नीचे गिर गए हैं, जबकि सपा में नया जोश आ गया है। यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने इस अंत की पटकथा स्वयं अमर सिंह ने ही लिखी है ‘दूसरे को नहीं दोष गुसाईं।’
अमर सिंह का जो हश्र हुआ वह उस दिन ही तय हो गया था जिस दिन उन्होंने सपा का दामन थामा था और धीरे-धीरे अपने पूंजीपति आकाओं अनिल अंबानी, सुब्रत राय सहारा और फिल्मी नर्तकियों का प्रवेश राजनीति में कराना शुरू किया था। अमर सिंह डेढ़ दशक तक मुलायम सिंह की आंखों का तारा बने रहे और उनका जादू मुलायम के सिर इतना चढ़कर बोला कि एक समय में जनेश्वर मिश्र के निवास पर हुई सपा संसदीय दल की बैठक में जब मोहन सिंह ने यह सवाल पूछा कि उन्हें भी मालूम होना चाहिए कि पार्टी के बड़े फैसले कहां लिए जाते हैं, तो मुलायम ने अपने समाजवादी साथियों को ही यह कहकर हड़काया था कि वह बाहर के लोगों से बाद में लड़ेंगे पहले अपने घर के विद्रोह को ठीक करेंगे।
अमर सिंह ने बहुत तेजी के साथ सपा पर कब्जा किया और आखिर में स्थिति यह हो गई थी कि सपा के बड़े से बड़े नेता पहले अमर सिंह को साष्टांग प्रणाम करते थे और बाद में मुलायम से दुआ सलाम करते थे। अच्छी तरह से याद है जब अमर सिंह सपा में शामिल हुए थे तब राज बब्बर ने उन्हें मुलायम के घर का रास्ता दिखाया था। उस समय अमर सिंह ने मुलायम का शुक्रिया अदा करते हुए जो पोस्टर छपवाया था उसमें मुलायम के साथ-साथ जनेश्वर मिश्र, आजम खां, बेनी प्रसाद वर्मा, रामगोपाल यादव और राज बब्बर की जिन्दाबाद के नारे लिखे हुए थे। लेकिन बाद में उन्होंने राज बब्बर को न सिर्फ बाहर का रास्ता दिखवाया बल्कि कहा तो यहां तक जाता है कि एक बार तो राज बब्बर को पार्टी का टिकट तब मिला जब उन्होंने बाकायदा अमर से क्षमा याचना की। इसी तरह बेनी प्रसाद वर्मा और आजम खां भी बेइज्जत करके सपा से बाहर किए गए।
जिन रामगोपाल यादव पर अमर सिंह इतना फायर हो रहे हैं वह रामगोपाल भी एकबारगी पार्टी में इतने साइडलाइन हो गए थे कि उन्हें डिप्रेशन में अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था। फैजाबाद में हुए पार्टी के कार्यकर्ता सम्मेलन में अमर सिंह ने रामगोपाल पर कई तंज कसे थे। वहां से लौटते ही रामगोपाल जबरदस्त बीमार पड़़ गए। अब सवाल यह उठता है कि आखिर वह कौन से कारण थे कि इतना सिर चढ़ने के बाद अमर सिंह मुलायम परिवार के खिलाफ हो गए?
कहा जा रहा है कि अमर सिंह पार्टी में बढ़ते परिवारवाद से नाराज हो गए थे। यहां दो बात साफ कर दी जाएं। पहली तो यह कि अमर सिंह को यह समझने में चैदह साल क्यों लग गए कि सपा में परिवारवाद है? दूसरे परिवार की अहमियत वही व्यक्ति समझ सकता है जो पारिवारिक हो। एक निजी टीवी चैनल पर अमर सिंह ने स्वयं कहा कि वह अपने पिता से नाराज होकर अठारह वर्ष की आयु में घर से निकल गए थे और जब मृत्यु शैया पर पड़े उनके पिता ने उनसे पूछा कि क्या वह अभी भी उनसे नाराज हैं तो अमर ने कहा कि अगर उन्होंने( पिता ने) उन्हें डांटा न होता तो वह कामयाब आदमी न बन पाए होते। अमर सिंह के इस वक्तव्य से परिवार के प्रति उनकी घृणा की ग्रन्थि को समझा जा सकता है।
अमर की परेशानी तभी बढ़ना शुरू हुई जब मुलायम के पुत्र अखिलेश की आमद सक्रिय राजनीति में हुई। दरअसल अमर सिंह का ख्वाब था कि मुलायम सिंह केन्द्र की राजनीति में स्थापित होने के बाद उत्तर प्रदेश की बागडोर उन्हें सौंप देंगे। इसीलिए उन्होंने एक-एक करके अपने रास्ते के कांटे बेनी और आजम को रास्ते से हटाया। रामगोपाल और शिवपाल से उन्हें खतरा इसलिए नहीं था क्योंकि रामगोपाल मास लीडर नहीं हैं और गुणा भाग की राजनीति नहीं करते। जबकि शिवपाल सिर्फ मुलायम के हनुमान हैं और उनके अन्दर राजनीति में कुछ हासिल करने की तमन्ना भी नहीं है। ऐसे में उन्हें लगने लगा कि अखिलेश के आने से उनका खेल खराब हो गया है।
हालांकि अमर सिंह ने पहले मुलायम सिंह को अच्छी तरह समझा लिया था कि अखिलेश को सक्रिय राजनीति में न लाया जाए। जब सपा की युवा इकाई के बड़े नेता राकेश सिंह राना ने अखिलेश को आगे लाने का प्रस्ताव रखा था तो बताते हैं मुलायम ने राना को बुरी तरह डपट दिया था। लेकिन बाद में राना ने जब जनेश्वर मिश्र को समझाया कि ‘नेता जी’ के बाद पार्टी का क्या होगा और अगर अखिलेश को आगे नहीं लाया गया तो पार्टी असामाजिक तत्वों और पूंजीपतियों के दलालों की बंधक होकर अपना अस्तित्व खो देगी, तब जनेश्वर मिश्र को यह बात क्लिक कर गई और आॅस्ट्रेलिया से शिक्षा प्राप्त करके स्वदेश लौटे अखिलेश को समाजवाद की कमान सौंपने की तैयारी हुई। स्व ़ जनेश्वर मिश्र ने पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में इस पूरी घटना का उल्लेख भी किया था। इस प्रस्ताव से खफा अमर सिंह ने तीन बार राकेश राना का विधानसभा का टिकट कटवाया और दो बार विधान परिषद में नाम तय हो जाने के बाद उनका रास्ता रोक दिया। बाद में राना विधान परिषद के सदस्य तभी बन सके जब अमर सिंह संकट के बादलों से घिरना शुरू हुए।
लेकिन यह बात भी सही है कि फिरोजाबाद में मुलायम की पुत्रवधु डिंपल को चुनाव लड़वाने का फार्मूला भी अमर का ही था। इसके पीछे रणनीति यह थी कि अगर डिंपल हार जाएंगी तो यादव परिवार अपने आप बैकफुट पर आ जाएगा और अगर जीत जाएंगी तो परिवारवाद के आरोप लगना शुरू हो जाएंगे। लेकिन उनका यही दांव उनके लिए घातक साबित हुआ और यादव परिवार को उनका गुणा भाग समझ में आ गया। बाद में जो कुछ हुआ वह सारी दुनिया ने देखा।
इधर आजम खां प्रकरण से भी अमर सिंह को काफी झटका लगा। हालांकि वह आजम खां को बाहर का रास्ता तो दिखाने में कामयाब हो गए लेकिन आजम खां और मुलायम की मुलाकात में आजम खां ने जो दो-चार बातें मुलायम से कहीं उन्होंने भी अमर की विदाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सूत्रों का कहना है कि जब आजम खां मुलायम से कल्याण सिंह के मसले को लेकर मिले तो उन्होंने कहा था कि वह ( आजम) पठान हैं और जिस दिन उन्हें ( मुलायम को) छोडें़गे उस दिन राजनीति छोड़ देंगे। बाकी पार्टी उन्हें छोड़ती है तो यह उसका फैसला होगा। आजम ने अपना वादा निभाया, उन्होंने पार्टी नहीं छोड़ी पार्टी ने ही उन्हें छोड़ा। एक और बात जो आजम ने कही उस बात ने फिरोजाबाद की हार के बाद मुलायम को सोचने पर मजबूर कर दिया। बताते हैं आजम ने कहा- नेता जी पैसे तो कभी भी कमा लिए जाएंगे लेकिन अगर वोट एक बार चला गया तो फिर लौट कर नहीं आएगा। और फिरोजाबाद में जिस तरह से मुस्लिम वोट झड़कर राज बब्बर को मिला उससे आजम के शब्द मुलायम के कानों में गूंजने लगे।
जाहिर है ऐसे में अमर सिंह को परेशानी तो होनी ही थी। लेकिन अमर सिंह अपने ही बुने जाल में इस कदर फंसे कि बाहर जाकर ही रुके। अब अमर सिंह राजनीतिज्ञ तो हैं नहीं। वह बेसिकली एक ब्रोकर हैं लेकिन उन्हें गलतफहमी हो गई कि वह राजनेता हो गए हैं। उधर अपनी आदत के मुताबिक जब अमर ने मुलायम के राज अपने सीने में दबे होने का शोशा छोड़ा तो स्थिति बेकाबू हो गई और अमर के निष्कासन की फाइनल स्क्रिप्ट लिख दी गई।
हालांकि अमर सिंह ने पहले कांग्रेस में जाने के लिए अपने संपर्क टटोले लेकिन वहां से मनाही हो गई। फिर उन्होंने राष्ट्रवादी कांग्रेस में जाने की तैयारी की लेकिन तब तक वह मुलायम के खिलाफ इतना जहर उगल चुके थे कि शरद पवार ने उन्हें लेना उचित नहीं समझा। वह भाजपा में जा सकते थे लेकिन वहां उनके मित्र राजनाथ अब कमजोर हो गए हैं और भाजपा में जाकर वह मुलायम को नुकसान भी नहीं पहुंचा सकते थे। दूसरा, मुलायम सिंह से किसी के भी राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं, उनकी नीतियों से असहमति हो सकती है लेकिन यह शिकायत कोई नहीं कर सकता कि उन्होंने कभी आॅफ द रिकाॅर्ड भी अपने किसी विरोधी के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया हो। इसलिए जब अमर सिंह, मुलायम पर हमलावर हुए तो उनके लिए सिर्फ और सिर्फ बहुजन समाज पार्टी का ही रास्ता बचा था। लेकिन वहां दिक्कत यह है कि मायावती स्वयं अमर सिंह से ज्यादा अशिष्ट हैं और उन जैसों को वहां वह फ्री हैण्ड नहीं मिल सकता जैसा सपा में मिला। इसलिए मायावती, अमर सिंह का प्रयोग मुलायम के जयचंद और मीरजाफर की तरह तो कर सकती हैं लेकिन उन्हें सतीश चन्द्र मिश्र, नसीमुद्दीन या बाबू सिंह कुशवाहा का दर्जा नहीं दे सकती हैं। दूसरे अमर सिंह के विषय में अब कहा जाने लगा है कि वह जब मुलायम के नहीं हुए तो किसी और के कैसे हो जाएंगे?
इधर अमर सिंह के सपा तोड़ने के दावे की पोल खुल गई। जिन विधायकों को उनका खासमखास समझा जाता था वह भी उनके साथ नहीं आए। इसका कारण साफ है। इन विधायकों ने ताड़ लिया है कि अमर सिंह व्यापारियों के ब्रोकर हैं और किसी भी दिन कहीं भी चुपके से निकल जाएंगे और इन विधायकों के गले व्यक्तिगत दुश्मनियां बांध जाएंगे। इसीलिए अमर के सर्वाधिक विश्वासपात्र माने जाने वाले विधायक अरविन्द सिंह गोप भी उनके साथ नहीं आए और न राजा भैया या अक्षय प्रताप सिंह उर्फ गोपाल जी। जो अशोक सिंह चन्देल और संदीप अग्रवाल निकाले गए हैं वह मूल रूप से सपाई नहीं हैं बल्कि भाजपा और बसपा से सपा में आए थे। अबू आसिम आजमी, जिन्हें अमर सिंह अपना बता रहे थे, भी उनके साथ नहीं आए। सांसद राधामोहन सिंह खुद सपा मुखिया से मिलकर कह आए कि वह पार्टी के साथ हैं और अमर के साथ नहीं। रही बात जया प्रदा की तो वह भी आसमानी नेता हैं उनका उत्तर प्रदेश से कुछ लेना देना नहीं है।
अनिल अंबानी भी, जो अमर सिंह के मित्र कहे जाते हैं, खुलकर अमर सिंह के समर्थन में नहीं ही आए। क्योंकि वह भी अच्छी तरह जानते हैं कि एक पूंजीपति की औकात एक साधारण से राजनीतिज्ञ के सामने भी कुछ नहीं होती है। अगर कोई विश्वनाथ प्रताप सिंह सरीखा नेता किसी भूरेलाल जैसे अधिकारी को एक घंटे के लिए भी पीछे लगा देता है तो धीरूभाई अंबानी और नुस्ली वाडिया जैसे पूंजीपतियों को भी दिन में तारे नजर आ जाते हैं।
अमर सिंह को कहीं रास्ता न मिलने की एक प्रमुख वजह यह भी है कि उन जैसे तथाकथित मैनेजरों की किसी भी दल को फिलहाल जरूरत नहीं है। कांग्रेस के पास उनसे ज्यादा अच्छे मैनेजर मौजूद हैं जो सभ्य और सुसंस्कृत भी हैं। भाजपा में भले ही प्रमोद महाजन अब नहीं रहे लेकिन उनकी कमी दूर करने के लिए वहां भी बड़े-बड़े मैनेजर हैं। फिर अमर सिंह को कोई क्यों ले?







Jan 23, '10



अमलेन्दु उपाध्याय
हाल ही में प््राधानमंत्री के साथ एक भेंट में मंत्रिपरिशद के कुछ राज्य मंत्रियों ने षिकायत की कि तवज्जो नहीं मिलती है और केबिनेट मंत्री भाव नहीं देते हैं। इन राज्यमंत्रियों का का दर्द उभर कर सामने आया उनका कहना था कि वह लगभग बेरोजगार हैं और उनके पास फाइलें ही नहीं आती हैं। यह एक संगीन मामला है और दर्षाता है कि जब राज्यमंत्रियों का यह हाल है तब एक आम संासद की क्या स्थिति होगी? जाहिर है इस अप्रिय स्थिति के लिए स्वयं प्रधानमंत्री और उनके केबिनेट सहयोगी भी दोशी हैं। लेकिन यह तस्वीर का एकपक्षीय पहलू ही है और उस चष्मे से देखा गया अर्धसत्य है जिस पर राज्यमंत्रियों के षीषे चढ़े हुए हैं। तस्वीर का दूसरा पहलू भी है और यह पहलू इन राज्यमंत्रियों की दलील को अगर झुठलाता नहीं है तो कम से कम इस दलील पर सवाल तो उठाता ही है।
पहला सवाल यही है कि क्या केवल फाइल निपटाने से ही मंत्री जी का काम हो जाता है? फाइलें निपटाने के अलावा मंत्रियों के पास और कोई काम नहीं होता? फिर तो बहुत से ऐसे केबिनेट मंत्री भी हैं जिनके पास फाइलें कम ही होती हैं। क्या इसका तात्पर्य यह है कि उन मंत्रियों के पास काम नहीं है? जबकि कई मंत्री ऐसे भी हैं जिनके पास फाइलें तो कम ही होती हैं लेकिन महीनों वह फाइलें देख ही नहीं पाते। आखिर काम होने का पैमाना क्या है?
अभी ज्यादा समय नहीं बीता होगा जब गृह मंत्री पी चिदंबरम ने कहा था कि उनके ऊपर काम का इतना बोझ है कि उनके विभाग को दो हिस्सों में बांट देना चाहिए। ऐसे में क्या देष का आम आदमी यह जानता है कि चिदंबरम के अलावा गृह विभाग में राज्यमंत्री भी होते हैं? फिर इस स्थिति के लिए कौन दोशी है? क्या चिदंबरम भी अपने राज्यमंत्रियों को काम नहीं देते हैं। इसी तरह बहुत से सांसद ऐसे हैं जो मंत्री तो नहीं हैं लेकिन उनकी बात गम्भीरता से सुनी जाती है और सरकार तथा नौकरषाही को उनकी बात पर गौर करने की मजबूरी होती है। यह उन सांसदों की योग्यता की वजह से है। सरकार की बात छोड़ भी दीजिए तो विपक्ष में ही कई ऐसे सांसद ऐसे हैं जिनकी अपनी एक पहचान और आवाज है जबकि वह कभी मंत्री नहीं रहे। नीलोत्पल बसु, वृन्दा कारत, गुरदासदास गुप्ता, कलराज मिश्रा, दिग्विजय सिंह ऐसे ही सांसद हैं। स्वयं कांग्रेस में मनीश तिवारी, मीनाक्षी नटराजन और अषोक तंवर कुछ ऐसे नाम हैं जिनकी अपनी एक पहचान है और उनके पास काम की भी कोई कमी नहीं है क्योंकि वह अपने क्षेत्र में काम करते हैं और जनता के बीच रहते हैं। इसी तरह राज्यमंत्रियों में सीपी जोषी, जितिन प्रसाद को काम न होने के लिए रोना नहीं पड़ता।
इस बात को दो तीन उदाहरणों से समझा जा सकता है। मरहूम राजेष पायलट आन्तरिक सुरक्षा राज्य मंत्री थे। लेकिन षायद अपने समकालीन केबिनेट मंत्रियों से ज्यादा व्यस्त भी थे और उनकी देष में एक वाॅइस भी थी। पिछली यूपीए-वन सरकार में भी श्रीप्रकाष जायसवाल भी राज्यमंत्री ही थे लेकिन उन्होंने अपनी पहचान बनाई। जबकि लालकृश्ण अडवाणी के साथ आईडी स्वामी राज्यमंत्री थे उन्होंने भी अपनी पहचान बनाई। इन सभी के पास काम होने में उनके केबिनेट मंत्रियों का कोई रोल नहीं था।
अब अगर इन राज्यमंत्रियों का ‘काम’ से तात्पर्य ठेके, परमिट, कोटा लाइसेंस देने से है तब तो उनका दुखड़ा जायज हो सकता है कि केबिनेट मंत्री सारी मलाई खुद मार लेते हैं और उन्हें ( राज्यमंत्रियों ) कोई नहीं पूछता। तब तो वाकई प्रधानमंत्री को मलाई का सही अनुपात में बंटवारा करने की व्यवस्था करनी चाहिए।
इन राज्यमंत्रियों के एक दर्द से बिना किसी किंतु परंतु के सहमत हुआ जा सकता है कि राज्यमंत्रियों की बात को अधिकारी नहीं सुनते। लेकिन यह समस्या भी केवल राज्यमंत्रियों के साथ नहीं है। बल्कि इस मुल्क में अफसरषाही बहुत ताकतवर और बेलगाम है। अफसर केवल उस केबिनेट मंत्री की ही बात सुनते हैं जो या तो स्वयं तेज हो और सौ फीसदी राजनीतिज्ञ हो या फिर प्रधानमंत्री का नजदीकी हो और उनका कुछ बिगाड़ने की हैसियत रखता हो। वरना मंत्री जी खुद अपनी फाइलें ढूंढते रह जाते हैं और फाइलें सरकारी चाल से ही चलती हैं। इस स्थिति के लिए भी केवल अधिकारियों को दोशी नहीं ठहराया जा सकता। कारण बहुत साफ है। जब संसद में तीन सौ करोड़पति सांसद पहुंच गए तो जाहिर है कि यह तीन सौ सांसद व्यापारी पहले हैं और राजनीति इनके लिए दोयम दर्जे का काम है। ऐसे में क्या उम्मीद की जा सकती है कि अधिकारी इन सांसदों और ऐसे मंत्रियों की बात सुनेंगे? इसलिए बेहतर होगा कि यह राज्यमंत्रीगण अपना दुखड़ा राने के बजाए अपनी बात में असर पैदा करें और यह असर तभी पैदा होगा जब वह सौ फीसदी राजनीतिज्ञ बनेंगे वर्ना चाहे राज्यमंत्री बन जाएं या केबिनेट यह दुख दूर नहीं होगा।








Dec 16, '09



यूपी का विभाजन देश बांटने की पटकथा लिखेगा 

|| अमलेन्दु उपाध् याय || 

तेलंगाना राज्य बनाने की केन्द्र सरकार ने घोषणा क्या की पूरे देश में नए राज्य बनाने की पुरानी मांगों ने जोर पकड़ लिया। गोरखालैण्ड, बोडोलैण्ड, विदर्भ, हरित प्रदेश, बुन्देलखण्ड समेत लगभग दो दर्जन नए राज्य बनाए जाने की मांग सामने आ गई है। लगे हाथ उत्तार प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने भी प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने की मांग कर डाली है।

'राहुल बाबा और सोनिया' की कांग्रेस भी पहले से ही इस मांग का समर्थन करती रही है। आखिर मामला क्या है? सारा देश एकदम बंटने को क्यों तैयार है? तेलंगाना की घोषणा के साथ ही उत्तर प्रदेश के विभाजन की बहस फिर से शुरू होर् गई है। सन 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग कर उत्तरांचल बनाया गया था उसके बाद भी उत्तर प्रदेश के बचे हुए भूभाग से कम से कम तीन और राज्य बनाने की मांग उठ रही है। थोड़े समय पहले ही केंद्रीय गृहमंत्रालय ने स्वीकार किया था कि बिहार से मिथिलांचल, गुजरात से सौराष्ट्र और कर्नाटक से कूर्ग राज्य अलग बनाने सहित कम से कम दस नए प्रदेशों के गठन की मांग की गई है। जबकि कई ऐसे राज्यों की भी मांगें उठ रही हैं जो बमुश्किल दो या तीन जिलों के बराबर हैं और उनकी दिल्ली तक आवाज अभी सुनाई नहीं पड़ी है। जैसे पश्चिम उड़ीसा में कौशलांचल राज्य या फिर हरियाणा में मेवात प्रदेश की मांग उठ रही है।

यहां यह जिक्र करना उचित होगा कि पं. जवाहर लाल नेहरू भाषाई आधार पर राज्यों के गठन का विरोध करते रहे थे लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता पोट्टी श्रीरामालू की मद्रास से आंधा्र प्रदेश को अलग किए जाने की मांग को लेकर 58 दिन के आमरण अनशन के बाद मौत और संयुक्त मद्रास में कम्युनिस्ट पार्टियों के बढ़ते वर्चस्व ने उन्हें अलग तेलुगू भाषी राज्य बनाने पर मजबूर कर दिया था। 22 दिसंबर 1953 में न्यायाधीश फजल अली की अध्यक्षता में पहले राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन हुआ। इस आयोग ने 30 सितंबर 1955 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस आयोग के तीनं सदस्य-जस्टिस फजल अली, हृदयनाथ कुंजरू और केएम पाणिक्कर थे। 1955 में इस आयोग की रिपोर्ट आने के बाद ही 1956 में नए राज्यों का निर्माण हुआ और 14 राज्य व 6 केन्द्र शासित राज्य बने। फिर 1960 में पुनर्गठन का दूसरा दौर चला, जिसके परिणामस्वरूप 1960 में बंबई राज्य को तोड़कर महाराष्ट्र और गुजरात बनाए गए।

1966 में पंजाब का बंटवारा हुआ और हरियाणा और हिमाचल प्रदेश दो नए राज्यों का गठन हुआ। इसके बाद अनेक राज्यों में बंटवारे की मांग उठी लेकिन कांग्रेस ने अपने राजनीतिक हितों को धयान में रखकर बड़े राज्यों के विभाजन पर विचार किया और अपरिहार्य होने पर ही धीरे- धीरे इन्हें स्वीकार किया। फिर 1972 में मेघालय, मणिपुर, और त्रिपुरा बनाए गए। 1987 में मिजोरम का गठन किया गया और केन्द्र शासित राज्य अरूणाचल व गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया। आखिर में वर्ष 2000 में भाजपा की मेहरबानी से उत्ताराखण्ड, झारखण्ड और छत्ताीसगढ़ अस्तित्व में आए।
1950 के दशक में बने पहले राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश में राज्यों के बंटवारे का आधार भाषाई था। इसके पीछे तर्क दिया गया कि स्वतंत्रता आंदोलन में यह बात शिद्दत के साथ उठी थी कि जनतंत्र में प्रशासन को आम लोगों की भाषा में काम करना चाहिए ताकि प्रशासन लोगों के नजदीक आ सके। इसी वजह से तब भाषा के आधार पर राज्य बने। अगर उस समय भाषा आधार न होता और तेलंगाना या उत्ताराखण्ड जैसी दबाव की राजनीति काम कर रही होती तो संकट हो सकता था। लेकिन उस समय भी इस फार्मूले पर ईमानदारी से काम नहीं किया गया। उस समय भी दो राज्य बंबई जिसमें गुजराती व मराठी लोग थे तथा दूसरा पंजाब जहां पंजाबी-हिंदी और हिमाचली भाषी थे, नहीं बाँटे गए। आखिरकार इन्हें भी भाषाई आधार पर महाराष्ट्र व गुजरात तथा पंजाब, हिमाचल व हरियाणा में बांटना ही पड़ा।

लेकिन भाषा के आधाार पर राज्यों के गठन का फार्मूला पूर्ण और तार्किक आधार नहीं था। अगर भाषा ही आधाार था तो विदर्भ को महाराष्ट्र से उसी समय अलग क्यों नहीं किया गया? आंधा्र को उसी समय क्यों नहीं तोड़ा गया? या सारे हिन्दी भाषी राज्यों को मिलाकर एक राज्य क्यों नहीं बनाया गया? क्या सभी हिन्दी भाषी राज्यों को मिलाकर एक राज्य बना देने से विकास किया जा सकेगा?
छोटे प्रदेश की वकालत करने वालों का तर्क है कि जनसंख्या एवं क्षेत्रफल की दृष्टि से कई राज्यों के आकारों में बड़ी विषमता है। एक तरफ़ तो बीस करोड़ से भी अधिक आबादी वाले उत्तर प्रदेश जैसे भारी भरकम राज्य तो वहीं सिक्किम जैसे छोटे प्रदेश जिसकी जनसंख्या मात्र छ: लाख है। इसी तरह एक ओर राजस्थान जैसा लंबा चौडा राज्य जिसका क्षेत्रफल साढे तीन लाख वर्ग किमी है वहीं लक्षद्वीप मात्र 32 वर्ग किमी ही है । किंतु तथ्य बताते हैं कि छोटे प्रदेशों में विकास की दर कई गुना अधिक है।

उदाहरण के लिए बिहार की प्रति व्यक्ति आय आज मात्र 3835 रु है जबकि हिमाचल जैसे छोटे राज्य में यही 18750 रु है । तर्क दिया जा रहा है कि छोटे राज्य बनने के बाद आर्थिक प्रगति होती है। इसके लिए हरियाणा और हिमाचल का उदाहरण दिया जाता है। लेकिन यह तर्क मिथ्या है। अच्छे प्रशासन के लिए छोटे राज्य ठीक हो सकते हैं लेकिन ये ही विकास की एकमात्र गारंटी कैसे हो सकते है? हरियाणा को छोड़ दिया जाए तो झारखण्ड, उत्ताराखण्ड और छत्ताीसगढ़ के संबंधा में विकास और अच्छे प्रशासन की बातें बेमानी साबित हुई हैं। किसी भी राज्य की प्रगति के लिए राजनीतिक स्थिरता जरूरी है, मगर झारखंड में नौ साल में छह मुख्यमंत्री बदले गए और भ्रष्टाचार व सार्वजनिक धान की जिस तरह से लूट खसोट की गई वह यह तर्क झुठलाने के लिए काफी है। इसी तरह छत्ताीसगढ़ में नक्सलवाद और राज्य प्रायोजित आतंकवाद 'सलवां जुड़ूम' इसका उदाहरण हैं जबकि उत्ताराखण्ड नौ वर्षों में अपनी राजधाानी ही तय नहीं कर पाया है। मणिपुर नगालैंड मिजोरम जैसे छोटे राज्य भी राजनीतिक तौर पर लगातार अस्थिर बने रहे हैं।

फिर जिस तरीके से प्रांतीयता के सवाल पर महाराष्ट्र में राज ठाकरे का आतंक फैला और मधय प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बाहरी लोगों को लेकर जो भाषा प्रयोग की या दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित जिस तरह से अक्सर यूपी बिहार से आने वाले लोगों के लिए जहर उगलती रही हैं, वह संघीय गणतंत्र के स्वास्थ्य के लिए कोई शुभ संकेत नहीं है। ऐसे में छोटे राज्य क्षेत्रीय भावनाओं को भड़काने वाले और हमारे संञ्ीय ढांचे को तोड़ने वाले भी साबित हो सकते हैं।

जहां तक नए राज्यों की मांग का सवाल है तो काफी हद तक यह केन्द्र सरकार की आर्थिक नीतियों की विफलता का नतीजा हैं। क्योंकि पिछड़े क्षेत्रों के लोगों को लगता है कि उनके साथ भाषा जाति, या क्षेत्र के नाम पर भेदभाव किया जा रहा है और नया राज्य बन जाने से उनका विकास होगा। असम से पृथक् किए गए नगालैंड, मणिपुर मिजोरम हों या मेञलय सभी छोटे हैं और सबकी अलग-अलग किस्म की जनजातीय आबादी और पहचान है। उनका असम के साथ रहना मुश्किल होता गया इसलिए इन्हें अलग राज्य बनाया गया। लेकिन क्या इन राज्यों का विकास हो पाया?

नए राज्यों की मांग के पीछे असल कारण राजनीतिक दलों व नेताओं की क्षेत्रीय राजनीतिक डॉन और मुख्यमंत्री बनने की इच्छा है। फिर ऐसी मांग करने वाले चाहे चौधारी अजित सिंह हों या मायावती। उत्तार प्रदेश को विभाजित करके हरित प्रदेश बनाए जाने की मांग कर रहे राष्ट्रीय लोकदल के नेता चौधारी अजित सिंह का सपना प्रदेश का मुख्यमंत्री बनना रहा है जिसके लिए उन्होंने कई अतार्किक समझौते भी किए हैं और कला बाजियां भी खाई हैं। उन्हें लगता है कि उत्तार प्रदेश के एक रहते वह जिंदगी भर मुख्यमंत्री नहीं बन सकते इसलिए हरित प्रदेश बन जाना चाहिए। तेलंगाना बुंदेलखंड हो या फिर हरित प्रदेश नए छोटे राज्यों की ऐसी तमाम मांगें जोर पकड़ रही हैं। इनके पीछे सामाजिक और आर्थिक और प्रशासनिक कारण तो हो सकते हैं लेकिन मुख्य कारण राजनीतिक ही हैे। स्वयं उत्तर प्रदेश कांग्रेस अधयक्ष रीता जोशी के इस कथन कि ' पहले मुलायम और अब मायावती उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य का प्रशासन चलाने में असमर्थ हैं। इसीलिए बुंदेलखंड सहित राज्य के दूसरे हिस्सों (पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वान्चल) के लोग अलग प्रदेश की मांग कर रहे हैं।' से नए राज्यों की मांग के पीछे छिपा राजनीतिज्ञों का दर्द समझा जा सकता है।

कांग्रेस समझती है कि उत्तार प्रदेश के एक रहते वह वहां कभी अब पूर्ण बहुमत में नहीं आ सकती इसलिए प्रदेश तोड़ दिया जाए। यही कारण है कि अब केन्द्रीय राज्यमंत्री और हाल ही तक झांसी के विधायक प्रदीप जैन 'आदित्य' ने राज्य विधानसभा में पृथक बुंदेलखंड बनाने का प्रस्ताव रखा। मायावती भी इसी डर में यूपी के चार हिस्से चाहती हैं। उन्हें लगता है कि अगर पश्चिमी उ.प्र. अलग राज्य अन जाए तो वहां पच्चीस प्रतिशत दलित मतों के सहारे वह जिन्दगी भर मुख्यमंत्री बनी रह सकती हैं।

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बांदा चित्रकूट झांसी ललितपुर और सागर जिले को मिलाकर बुंदेलखंड राज्य बनाने की मांग उठती रही है। कांग्रेस भी इस की आग पर अपनी रोटियां सेंकती रही है। राहुल गांधाी ने बुन्देलखण्ड को जो स्पेशल आर्थिक पैकेज दिलवाया उसके पीछे विकास नहीं बल्कि कांग्रेस को पुनर्जीवित करने की राजनीति है। इसी लालच में मायावती भी उ.प्र. को तोड़ने की बात कर रही हैं। क्योंकि उन्हें भी लगता है कि उ.प्र. बंट गया तो वह जिन्दगी भर मुख्यमंत्री बनी रहेंगी।

पहले पुनर्गठन आयोग ने यूपी के विभाजन के खिलाफ राय जताई थी तथा पं. नेहरू व गोविंद वल्लभ पंत भी उसके तर्को से सहमत थे। दिल्ली के प्रथम मुख्यमंत्री चौधारी ब्रह्म सिंह दिल्ली, हरियाणा, पश्चिमी उत्तार प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्सों को मिलाकर 'वृहत्तार दिल्ली' बनाए जाने के पक्षधार थे। उनकी सोच थी कि यह जाट प्रदेश बन जाए तो उनकी पांचों ऊंगलियां घी में रहेंगी। उनका पं गोबिन्द वल्लभ पंत ने जोरदार विरोधा किया था। समय के साथ साथ यह मांग पीछे चली गई।

नए राज्यों के पुनर्गठन के लिए सुझाव देते वक्त 'राज्य पुनर्गठन आयोग' ने ही कई विवादों को जन्म दे दिया। आयोग की राय के खिलाफ जाकर उत्तर प्रदेश के टुकड़े कर छोटे राज्य बनाने का सुझाव फजल अली आयोग के सदस्य सरदार केएम पणिक्कर ने ही दिया था। उत्तर प्रदेश के बंटवारे के वह पहले प्रस्तावक थे। अपने प्रसिध्द असम्मति-पत्र, में पणिक्कर ने उत्तर प्रदेश को अंविभाजित रखने के आयोग के फैसले से असहमति जताते हुए देश की कुल आबादी के छठे भाग को एक ही राज्य में रखने को नासमझी करार दिया था।? अब उनकी इस टिप्पणी को आधाार बनाकर शासन कर पाने में असमर्थ नाकारा राजनेता उत्तार प्रदेश को बांटने की सिफारिश कर रहे हैं। उधार पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों को मिलाकर 'भोजपुर' राज्य बनाने की मांग भी की जा रही है जबकि मिथिला भाषी हिस्से को 'मिथिलांचल 'राज्य बनाने की मांग भी हो रही है।

गोरखा जनमुक्ति मोर्चा जीजेएम पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग और आसपास के क्षेत्रों को मिलाकर गोरखालैण्ड बनाने की मांग कर रहा है और भाजपा इसका समर्थन कर रही है। भाजपा का सोचना है कि गोरखालैण्ड बन जाने से उसकी ताकत में थोड़ा इजाफा हो जाएगा क्योंकि जीजेएम के सहयोग से ही पं बंगाल के रास्ते लोकसभा में पहुंचने का उसका खाता पहली बार खुला है।

पश्चिम बंगाल और असम के क्षेत्रों को मिलाकर 'वृहद कूच बिहार' बनाए जाने की मांग उठती रही है। पं. बंगाल के ही उत्तारी जिलों को मिलाकर 'कामतापुर राज्य' बनाए जाने की मांग भी उठ रही है। तो असम के कछार, हैलाकांडी, और करीम गंज सहित कुछ जिलों को मिलाकर बराक घाटी राज्य की मांग भी उठती रहती है। जबकि बोडोलैण्ड की मांग तो काफी हिंसक रूख अख्तयार कर चुकी है।

मध्य प्रदेश में भी कई राज्य बनाए जाने की मांग की जा रही है। 'गोंडवाना' क्षेत्र को अलग करके गोंडवाना राज्य की मांग की जा रही है तो महाकोशल क्षेत्र को अलग करके 'महाकोशल* राज्य बनाए जाने की मांग भी की जा रही है।

इतना ही नहीं उत्तार प्रदेश, राजस्थान और मध्यप्रदेश के कुछ जिलों को मिलाकर 'चंबल राज्य' बनाए जाने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू हो चुका है। राजस्थान में भी 'मरू प्रदेश' और 'मेवाड़' की मांग यदा-कदा उठती रहती है। ताजा मांग उदयपुर में हाईकोर्ट बेंच के बहाने 'मेवाड़' प्रदेश की है जिसे भाजपा नेता किरण माहेश्वरी हवा दे रही हैं।

आंधा्र प्रदेश में ही तेलंगाना के अलावा तटीय जिलों को मिलाकर रायलसीमा और काकतीय राज्य की मांग भी जोर पकड़ रही है। महाराष्ट्र में विदर्भ की अलग राज्य की मांग बहुत पुरानी है। जबकि इसके बरार क्षेत्र को भी अलग राज्य की मांग की जाती रही है। गुजरात से सौराष्ट्र राज्य अलग बनाने की है जो पिछले कई वर्ष से गृह मंत्रालय के समक्ष लंबित है।

कुल मिलाकर नए राज्यों की मांग विशुध्द राजनीतिक है और इसका विकास या अच्छे प्रशासन से कोई लेना देना नहीं है। प्रदेशों को बांटने की मुहिम क्या देश तोड़ने की मंजिल पर जाकर रूकेगी? खासतौर पर उ.प्र. बंटा तो मुल्क बंटने की पटकथा लिखी जाएगी। 
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Dec 01, '09



भाजपा को नहीं मिलेगा लिब्राहन की रिपोर्ट का लाभ
भाजपा को नहीं मिलेगा लिब्राहन की रिपोर्ट का लाभ





अमलेन्दु उपाध्याय



आखिरकार सरकार को लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट संसद के पटल पर रखने को विवश होना ही पड़ा। और यह रिपोर्ट पेश होते ही इसका फायदा उठाने के लिए सियासी कुश्ती शुरू भी हो गई है। समझा जा रहा है कि यह रिपोर्ट डूबती भाजपा के लिए संजीवनी का काम करेगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या भाजपा को इस रिपोर्ट के आने से कोई फायदा मिलेगा? लगता तो नहीं है।






प्रथम दृष्टया तो यह सरकार की तरफ से चला गया दांव ही लग रहा है। भले ही रिपोर्ट लीक मामले पर गृहमंत्री पी चिदंबरम यह आश्वासन दें कि गृह मंत्रालय से किसी ने भी इस बारे में किसी से बातचीत नहीं की है और इसकी एक ही प्रति है और वह पूरी हिफाजत से रखी गई है। लेकिन समझने वाले समझते हैं कि कहीं न कहीं इस रिपोर्ट लीक के पीछे हाथ कांग्रेस और केंद्र सरकार का ही है। क्योंकि बाबरी मस्जिद (ढांचा नहीं मस्जिद ही पढ़ा जाए) को शहीद किया जाना कोई छोटी मोटीे घटना नहीं थी। 6 दिसंबर 1992 स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसा मोड़ था जिसने भारतीय राजनीति की दिशा ही बदल दी। तब ऐसे मौके पर कांग्रेस भला क्यों भाजपा को इस रिपोर्ट का फायदा उठानें देना चाहेगी? वैसे भी सत्रह साल बाद लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट का कोई बहुत मतलब नहीं रह जाता.






जहां तक मस्जिद विध्वंस के दोषियों का सवाल है तो आज अपनी रिपोर्ट में अगर लिब्राहन ने किसी राजनीतिक व्यक्ति को इस ञ्टना के लिए षडयंत्र का दोषी माना भी है तो अब इससे क्या होगा? जितने लोगों की गवाही इस आयोग के सामने हुई है और जिन 68 को आयोग ने दोषी ठहराया है, उनमें से अधिकांश लोगों पर रायबरेली की कोर्ट में मुकदमा पहले से ही चल रहा है. फिर किसी एक ञ्टना में एक ही व्यक्ति पर दो मुकदमें नहीं चलाए जा सकते. रायबरेली की अदालत से कोई फैसला आने के बाद ही उस पर आगे की कार्रवाई तय होगी. जबकि इनमें से कई अब अल्लाह मियां को प्यारे हो चुके हैं।






इसलिए इस रिपोर्ट का कोई कानूनी मतलब नहीं रह गया है हां इसके राजनीतिक निहितार्थ जरूर हैं और उन्हें पूरा करने के लिए ही भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस में युध्द छिड़ा है।


हां सवाल है कि लिब्राहन आयोग का प्रतिवेदन केंद्र सरकार और स्वयं आयोग के पास था। यह प्रतिवेदन कार्रवाई रिपोर्ट के साथ संसद में पेश किया जाना चाहिए था, लेकिन इससे पहले ही यह मीडिया को लीक कैसे हो गया? अब अगर चिदंबरम सच बोल रहे हैं कि सरकार ने यह रिपोर्ट लीक नहीं की है तो किसने की? क्या गश्ह मंत्री का इशारा जस्टिस लिब्राहन की तरफ है? तो सरकार उनके खिलाफ क्या कदम उठाएगी? यह मामला इसलिए भी गम्भीर है कि संसद का सत्र चल रहा है और जो रिपोर्ट इस सत्र में पेश की जानी थी उसका मीडिया में लीक हो जाना संसद की तौहीन है और जाहिर है कि इस तौहीन का इल्जाम सरकार पर ही आयद होता है। जस्टिस लिब्रहान के विषय में आम धाारण्ाा है कि वह बहुत ईमानदार हैं और रिपोर्ट लीक करने जैसा घटिया काम कतई नहीं कर सकते। अखबार ने भी 'गश्ह मंत्रालय के सूत्रों' का उल्लेख किया है। इसलिए संदेह के घेरे में तो चिदंबरम का मंत्रालय ही है।






फिर सवाल यह है कि इस रिपोर्ट के समय से पहले लीक होने से फायदा किसे है? जाहिर है कि जबर्दस्त अंदरूनी कलह से जूझ रही भाजपा इस रिपोर्ट का कुछ भी फायदा लेने की स्थिति में नहीं है। ऐसा नहीं है कि वह इसका फायदा लेना नहीं चाहती लेकिन ऐसा अवसर फिलहाल तो उसके पास नहीं है। हालांकि अडवाणी जी इसका व्यक्तिगत फायदा उठाना चाहते हैं जैसा उनके लोकसभा में भाषण से स्पष्ट भी हो गया लेकिन क्या भाजपा इसका फायदा उन्हें उठाने देगी? हालांकि उदार दिखने की चाहत में अडवाणी जी आयोग के सामने जो बयान दे बैठे थे वह उन्हें इसका लाभ लेने से रोकेगा, जिसमें उन्होंने कहा था कि बाबरी मस्जिद तोड़े जाने का दिन उनकी जिंदगी का सबसे दुखदाई दिन था। उन्होंने इस ञ्टना की तुलना 1984 के सिख विरोधी दंगों से करते हुए आयोग से कहा था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के दंगे में सिखों के खिलाफ भड़की हिंसा 6 दिसंबर से ज्यादा शर्मनाक थी। अब किस मुंह से अडवाणी इसका लाभ उठा पाएंगे?






वैसे यह रिपोर्ट भाजपा के लिए एक सुनहरा अवसर साबित हो सकती थी लेकिन सत्ताा के लालच में वह यह अवसर स्वयं गंवा चुकी है। उसकी राम मंदिर की काठ की हांडी एक नहीं तीन तीन बार आग पर चढ़ चुकी है और अब चढ़ने से रही। भाजपा अपनी असल सूरत छिपाने के चक्कर में लगातार ऊहापोह की शिकार रही है। एक तरफ अटल अडवाणी की मंडली लगातार 6 दिसंबर 1992 के लिए माफी भी माँगती रही है और दूसरी तरफ भाजपा 6 दिसंबर को शौर्य दिवस भी मनाती रही है। आखिर बाबरी मस्जिद शहीद किए जाने की जिम्मेदारी स्वीकार करने से भाजपा शरमाती क्यों रही है? और अगर यह काम उसने नहीं किया था तो हर 6 दिसंबर को शौर्य किस बात का?






भाजपा को इस प्रकरण का कोई लाभ न मिल पाने का एक महत्वपूर्ण कारण है। भाजपा अभी तक इसी उधोड़बुन में है कि अडवाणी जी को अपना नेता माने या न माने। पिछले एक वर्ष में जिस तरह से अडवाणी जी के ऊपर संघ परिवार ने हमले किए हैं वह भाजपा की अंदरूनी कलह को उजागर करते हैं। भाजपा को इस रिपोर्ट का फायदा मिल भी सकता था अगर उसके सेनापति अडवाणी जी बने रहें। लेकिन अडवाणी जी से तख्त-औ-ताज और उनका चैन-औ-करार छीनने को बेताब राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, अरूण जेटली वैंकेया नायडू और गडकरी की कंपनी क्या ऐसा होने देगी? भाजपा की सैकेण्ड लाइन लीडरशिप बहुत जल्दी में है। अगर अडवाणी जी दो चार साल ही और टिक गए तो उसके तो सारे अरमानों पर पानी फिर जाएगा। इसलिए यह मंडली कभी नहीं चाहेगी कि अडवाणी जी को इसका कोई फायदा व्यक्तिगत रूप से मिले और जब तक अडवाणी जी को इसका लाभ नहीं मिलेगा तब तक भाजपा को भी इसका कोई लाभ मिलने से रहा।






फिर भाजपा अटल और अडवाणी के बाद कोई भी गंभीर और हद दर्जे का चतुर नेता पैदा नहीं कर पाई है जो कारगिल में हुई अपनी थुक्का फजीहत को भी 'विजय' के रूप में कैश कर सके और खूंखार आतंकवादियों की दामाद की तरह खातिरदारी कर कंधाार छोड़ आने के बाद भी अडवाणी जी को 'लौह पुरूष' की तरह प्रोजेक्ट कर सके।






इसके अलावा भी भाजपा की समस्याएं कम नहीं है। हर सांप्रदायिक और कट्टर आंदोलन का उभार एक निश्चित समय के लिए होता है उसके बाद उसका पराभव होता है। राम मंदिर आंदोलन के बहाने भाजपा ने जिस सांप्रदायिक और फासीवादी उभार को पाला पोसा था उसका गुब्बारा 6 दिसंबर 1992 के साथ ही फूटा और उसकी सारी हवा उस दिन निकल गई जब भाजपा ने सत्ता में आने के लिए राम मंदिर, धाारा 370 और यूनिफॉर्म सिविल कोड जैसे मुद्दों को छोड़ा। उग्र हिंदू तबके में उसकी विश्वसनीयता उसके इस कृत्य से घट गई। अब अगर लिब्रहान के बहाने भाजपा ऊंगली कटाकर शहीद होने का नाटक करती भी है तो भी यह उग्र हिंदू तबका उसके हाथ आने से रहा।






दूसरे इन सत्रह सालों में गंगा में बहुत पानी बह चुका है। सबसे बड़ी बात यह है कि पिछले डेढ़ दशक में भारत का आर्थिक परिदृश्य बड़ी तेजी से बदला है। उदारीकरण और वैश्वीकरण के आने के बाद वह मधय वर्ग जो भाजपा का हिमायती समझा जाता है उसकी एक नई पीढ़ी तैयार हो चुकी है। यह नई पीढ़ी सांप्रदायिक तो है पर है शुध्द व्यावसायिक और पेशेवर। पेप्सी, कोला, पिज्जा बर्गर और मिनरल वाटर पर पलने वाली यह पीढ़ी दंगों से अपने आर्थिक हितों पर होने वाली चोट को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। जबकि भाजपा समेत हर फासीवादी सांप्रदायिक उभार के लिए दंगे अनिवार्य शर्त हैं। इसका गंभीर पहलू यह भी है कि इस आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण को भाजपा ने भी कांग्रेस के साथ साथ पाला पोसा है।






हालांकि भाजपा ने इस रिपोर्ट का लाभ उठाने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। राज्यसभा में जिस तरह से एसएस अहलूवालिया और भाजपा के परम मित्र और कल तक कल्याण सिंह के परम सखा रहे और कल्याण सिंह की तुलना जनाब-ए- हुर से करने वाले अमर सिंह में जिस तरह नूरा कुश्ती हुई उससे संकेत मिल गया है कि भाजपा अब मुलायम सिंह की मदद से इस मुद्दे पर देश के सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने का प्रयास करेगी। ताज्जुब इस बात का है कि मुलायम सिंह के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी जो लगातार बाबरी मस्जिद की कमाई खाती रही है, इस मुद्दे पर चुप लगा गई थी क्यों कि तब कल्याण सिंह उसके साझीदार हो गए थे और मुलायम सिंह ने तो यहां तक कह दिया था कि बाबरी मस्जिद का मुद्दा अब पुराना पड़ गया है। लेकिन अब फिर सपा को भी इस रिपोर्ट के बहाने बाबरी मस्जिद याद आने लगी है।






कुल मिलाकर कांग्रेस ने इस रिपोर्ट को सही वक्त पर लीक कराकर एक बार फिर बाजी मार ली दिखती है। क्योंकि हाल फिलहाल में कहीं चुनाव भी नहीं होना है और लोकसभा चुनाव भी दूर हैं। और अगर यह रिपोर्ट ऐसे समय लीक होती जब संसद सत्र नहीं चल रहा होता तो जो हंगामा भाजपा अपनी मित्र समाजवादी पार्टी के साथ सदन में कर रही है तब सड़कों पर कर रही होती। साथ ही अभी भाजपा इसी उलझन में फंसी हुई है कि अडवाण्ाी जी को अपना नेता माने या न माने और अगर इसका कुछ फायदा अडवाणी जी के खाते में जाता भी है तो उससे भाजपा को कोई लाभ नहीं होना है। दूसरी तरफ उत्तार प्रदेश जहां कांग्रेस इस समय चौतरफा लड़ाई लड़ रही है वहां उसे फायदा होगा क्योंकि वह मुलायम सिंह जो कल तक कह रहे थे कि बाबरी मस्जिद विधवंस मामले में कल्याण सिंह दोषी नहीं हैं वह अब किस मुंह से लिब्राहन की रिपोर्ट पर हाय तौबा मचाएंगे? अब कांग्रेस के पास उन्हें उत्तार प्रदेश में घेरने का आधाार होगा। वैसे भी अब मुलायम सिंह के सारे पुराने साथी साथ छोडत्र चुके हैं और दलालों को जनता जानती है।






उधार कल्याण सिंह भी जो अभी कुछ दिन पहले ही छह दिसंबर 1992 के लिए मुसलमानों से माफी मांग रहे थे तुरंत हिन्दू हो गए हैं और जोर शोर से अपने शहीद होने का बखान कर रहे हैं॥ बाबरी मस्जिद तोड़े जाने के समय कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। हालांकि वे लिब्राहन कमीशन के सामने पेश होने से ग्यारह साल तक बचते रहे। उन्होंने इसके खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर करके कहा था कि आयोग के सामने पेश होने पर सीबीआई कोर्ट में उनके खिलाफ चल रहे मुकदमे पर प्रभाव पड़ेगा। पर कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी तो उन्हें गवाही देने पेश होना पड़ा। तब उन्होंने दावा किया था कि उनकी सरकार ने बाबरी मस्जिद को बचाने के पूरे इंतजाम किए थे लेकिन केंद्र की कांग्रेस सरकार ने ऐसी परिस्थिति तैयार की जिससे मस्जिद टूटी।




हालांकि दिक्कतें कांग्रेस के सामने भी हैं। ऐसे में लगता नहीं कि कांग्रेस ईमानदारी से इस रिपोर्ट पर कार्रवाई करेगी? क्योंकि सवाल तो कांग्रेस से भी होंगे ही। सरकार ने जो एटीआर प्रस्तुत की है उससे उसकी मंशा जाहिर हो गई है। नरसिंहा राव ने आयोग को दिए अपने बयान में कहा था कि 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार के हाथ बंधक बन गई थी। अयोध्या में कारसेवकों की भीड़ बढ़ने के साथ-साथ हालात खराब होते गए। उन्होंने सफाई दी थी कि केंद्र सरकार के हाथ बंधे हुए थे। राव ने कहा था कि इतिहास उनके साथ न्याय करेगा। लेकिन सवाल यह है कि यह न्याय कैसा होगा जब उनकी पार्टी ही अब उनका नाम लेने से कतराती है?






मानना पड़ेगा चिदंबरम भाजपा के नेताओं के मुकाबले कहीं अधिाक चतुर सुजान हैं जिन्होंने एक छोटी सी चाल चलकर भाजपा समेत अपने सारे विरोधिायों को चित्ता कर दिया है। आयोग की रिपोर्ट लीक होने से कांग्रेस को सीधा राजनीतिक फायदा मिलेगा वहीं भाजपा को इस रिपोर्ट से अब कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि अब वह अपनी सारी ऊर्जा इस बात पर खर्च कर देगी कि रिपोर्ट लीक कैसे हुई? 

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Nov 13, '09



पत्रकारिता के शिखर पुरुष प्रभाष जोशी
पत्रकारिता के शिखर पुरुष प्रभाष जोशी

हिन्दी पत्रकारिता के भीष्म पितामह प्रभाष जोशी हमेशा के लिए इस दुनिया को छोड़ गए हैं। उनके साथ ही 'मिशन पत्रकारिता' के एक पूरे युग का अंत हो गया है। प्रभाषजी पत्रकारिता के भीष्म पितामह जरूर थे लेकिन जब-जब पत्रकारिता की द्रोपदी की लाज लुटी वह द्रोपदी की रक्षा के लिए आगे बढ़कर आए। अपने जीवन के अंतिम क्षणों में भी वह अखबारों में कम होती संपादक की भूमिका और अखबार मालिकों के पैसे लेकर खबरें बेचने के कारनामों के खिलाफ लड़ते रहे

अमलेन्दु उपाध्याय
अब नहीं रहे। यह खबर सुनने में अटपटी लगती है पर है सच। प्रभाषजी के साथ पत्रकारिता के एक पूरे युग का अन्त हो गया और उनका यूं अचानक चले जाना उन लोगों के लिए किसी वज्रपात से कम नहीं है जो पत्रकारिता को एक मिशन मानकर और आम आदमी का सच्चा प्रतिनिधिा मानकर काम करते हैं।
प्रभाषजी, राजेन्द्र माथुर के बाद उस मायने में सच्चे पत्रकार थे जो पत्रकारिता के जरिए सार्थक दिशा में समाज बदलने की चाहत रखते थे और कुल मिलाकर खांटी पत्रकार थे। ऐसा भी नहीं है कि राजेन्द्र माथुर या प्रभाषजी के अलावा समकालीन दौर में पत्रकारिता के क्षेत्र में बड़े नाम वालों की कोई कमी हो। अज्ञेय, धार्मवीर भारती, कमलेश्वर, रघुवीर सहाय कुछ ऐसे लोग रहे जिन्होंने पत्रकारिता के नए मानदण्ड स्थापित किए। लेकिन प्रभाषजी को एक बात जो बाकियों से अलग कर उन्हें राजेन्द्र माथुर की श्रेणी में रखती है, वो यह है कि प्रभाषजी सौ फीसदी पत्रकार थे। वह न तो साहित्य में नाम कमाने के बाद पत्रकारिता में आए थे और न ही साहित्य में विफल होने के बाद। जिस तरह रघुवीर सहाय की कविता को आम आदमी का रोजनामा तथा 'राजनीति और विरोधा' की कविता कहा जाता है ठीक उसी तरह प्रभाषजी की पत्रकारिता आम आदमी के दुख दर्द के लिए थी। प्रभाषजी ने अपने लगभग चार दशक की पत्रकारिता के दौर में पत्रकारों की जो एक पौधा लगाई वह भी सौ फीसदी सच्चे पत्रकारों की थी। यह प्रभाषजी का ही कौशल था कि उनकी टीम में अगर राम बहादुर राय, बनवारी थे तो अभय कुमार दुबे, अंबरीश कुमार जैसे लोग भी थे। आलोक तोमर, प्रदीप सिंह, सुशील कुमार सिंह, निरंजन परिहार, उमेश जोशी, ओम थानवी प्रभातरंजन दीन जैसे लोग प्रभाषजी की ही देन हैं।
मेरा प्रभाषजी से सीधाा कभी कोई वास्ता तो नहीं रहा लेकिन एक खुशी है कि उनके जीवन की आखिरी मुहिम, जिसमें उन पर काफी हमले भी हुए, में मैं भी शामिल रहा। विगत लोकसभा चुनाव में हिन्दी पट्टी में कई बड़े अखबारों ने पैसे लेकर खबरें छापीं। प्रभाषजी ने बाकायदा अखबारों के इस कारनामे के खिलाफ आंदोलन चलाया। उस वक्त मैं रामबहादुर राय जी द्वारा संपादित पत्रिका 'प्रथम प्रवक्ता' में था। राय साहब ने इस मुद्दे पर देश भर से जानकारी इकट्ठा करने और आई हुई खबरों को संपादित करने की जिम्मेदारी मेरे ऊपर ही डाली। इस दौरान एक घटना हुई जो प्रभाषजी के साथ साथ राय साहब की पत्रकारिता की भी पहचान कराती है। हमारे झारखंड के संवाददाता की खबर आई कि 'प्रभात खबर' में भी खबरें विज्ञापन के रूप में छपीं लेकिन उनके नीचे और ऊपर पीके मीडिया इनीशिएटिव लिखकर यह बताने का प्रयास किया गया कि यह खबर नहीं है।
ऐसे समय संकट इस बात का था कि 'प्रभात खबर' के संपादक हरिवंशजी, राय साहब के भी मित्र हैं और प्रभाषजी से भी उनका नजदीकी संबंधा था। मैंने राय साहब से कहा कि झारखंड से ऐसी खबर आई है क्या देना उचित रहेगा? राय साहब ने कहा कि जरूर दिया जाएगा। अगर खबर आई है तो वह किसी ने भी किया हो दिया जाएगा। इसके बाद सारी खबरें प्रभाषजी के भी पास गईं, जिनके आधाार पर उन्होंने अपना लेख लिखा। तभी अचानक 24 जून को मैंने प्रथम प्रवक्ता छोड़ दिया। लेकिन जब जुलाई के पहले हफ्ते में 'प्रथम प्रवक्ता' का अंक आया तो सारी खबरें ज्यों की त्यों अक्षरश: वैसी ही प्रकाशित हुईं जैसी मैंने संपादित की थीं। यह था प्रभाषजी का एक पत्रकार का रूप। अगर प्रभाषजी चाहते तो झारखंड की रिपोर्ट पर सवाल कर सकते थे, राय साहब से उसे न देने के लिए भी कह सकते थे। पर मिशन में मित्रता आड़े नहीं आई।
इसी तरह एक पूरी की पूरी पीढ़ी प्रभाषजी को पढ़ सुनकर ही पत्रकारिता में जवान हुई है और उसे पत्रकारिता के यह संस्कार कि जिस समय तुम पत्रकार हो उस समय तुम्हारा पहला और आखिरी धार्म पत्रकारिता ही है, प्रभाषजी ने ही दिए। इसलिए आज पत्रकारिता का जो वीभत्स कारपोरेटीक(त स्वरूप सामने आ रहा है उसमें प्रभाषजी हम जैसे उन पत्रकारों के रक्षा कवच थे जो पत्रकारिता को मिशन मानते हैं कमीशन नहीं। जाहिर है उनके जाने के बाद पत्रकारिता का स्वरूप और बदलेगा और नई चुनौतियां भी होंगी लेकिन प्रभाषजी सच्चे पत्रकारों के लिए प्रकाश स्तम्भ का काम करते रहेंगे।
amalendu@thesundaypost.in
amalendu.upadhyay@gmail.com 


[ Published in “The Sunday Post” 22nd November issue]









Oct 10, '09




कोबाड़ का रास्ता!
अमलेन्दु उपाध्याय 

पिछले महीने गिरफ्तार किए गए नकसली नेता कोबाड़ गांधी की दिल्ली में गिरफ्तारी से देष में एक बहस छिड़ गई है। पहले जब नक्सल समस्या पर बहस होती थी तब इसे कुंठित युवाओं की सत्ता लालसा या भटके हुए वामपंथी अतिवादी बताकर इसे कानून व्यवस्था का प्रष्न बता दिया जाता था और राजकाज चलता रहता था। लेकिन इस बार बहस कुछ नए किस्म की है।
कोबाड़ गांधी इसके लिए बधाई के पात्र हैं कि उनके बहाने ही सही नक्सलवाद एक बार फिर चर्चा में है और उनकी गिरफ्तारी के बहाने ही सही, माओवादी आन्दोलन को फिर से समझने की जरूरत महसूस की जाने लगी है। भले ही गृह मंत्री पी. चिदंबरम नक्सलवाद को सबसे बड़ा खतरा बता रहे हों लेकिन उनकी सरकार में ही लोग उनके इस विचार से पूर्णतया सहमत नहीं दिखते हैं। स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यह कहने को मजबूर हो गए हैं कि नक्सलवाद सिर्फ कानून व्यवस्था का मामला नहीं है। और यह बात सही भी है। कानून व्यवस्था के मसले दषकों तक नहीं चला करते हैं। नक्सलवाद इस देष में लगभग तीन दषक से भी ज्यादा समय से पनप रहा है और इसका प्रभाव कम होने के बजाए लगातार बढ़ता ही गया है। किसी भी आतंकवादी आन्दोलन के पूरे दौर में जितने आतंकवादी मारे जाते होंगे उससे कहीं ज्यादा नक्सली हर साल पुलिस के हाथों मारे जाते हैं। अकेले छत्तीसगढ़ में एक वर्श में चार सौ के आसपास कथित नक्सली मारे गए हैं। लेकिन कोई तो बात है जो नक्सलवाद का जुनून बढ़ता ही जाता है।
दिल्ली की गद्दी पर बैठे हुक्मरानों और पूॅंजीवादी रुझान के बुद्धिजीवियों के माथे पर इस प्रष्न को लेकर चिंता की लकीरें गहरी हो गई हैं कि आखिर क्या बात है कि कोबाड़ गांधी जैसे लोग अपने कैरियर, घरबार और व्यापार को छोड़कर इस तरह के आन्दोलन से न केवल जुड़ जाते हैं बल्कि अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देते हैं। ताज्जुब इसलिए भी होता है कि अतिवामपंथी आंदोलन से जुड़ने वाले लोग न तो धर्म के पहरूए हैं, न जेहादी हैं, न जातिवादी आन्दोलन से निकलकर आए हैं। फिर उन्हें यह जुनून कहाॅं से मिलता है?
यहाॅं यह याद रखना चाहिए कि कोबाड़ गांधी इस तरह का पहला उदाहरण नहीं हैं, जिन्होंने माक्र्सवाद के सिद्धान्तों के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया हो। इससे पहले भी ईएमएस नंबूदरीपाद जैसे लोग भी हुए हैं जिनका राजघराने से ताल्लुक रहा और उनकी जमींदारी देष में सर्वाधिक मालगुजारी वसूलने वाली रियासत समझी जाती थी। लेकिन नम्बूदरीपाद अपनी सारी संपत्ति कम्युनिस्ट पार्टी को सौंपकर पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए थे। कोबाड़ गांधी के जुनून को एक और तरीके से समझा जा सकता है। गौतम बुद्ध भी अपना सारा राजपाट छोड़कर दुख के निदान की तलाष में ही भिक्षु बन गए थे। लेकिन बुद्ध का रास्ता अध्यात्म का था, पलायन का था और कोबाड़ ने जो रास्ता चुना, वह है तो बुद्ध के समानान्तर ही लेकिन वह विचार का रास्ता है, संघर्श का रास्ता है, पलायन का नहीं।
यह भी बात गौेर करने लायक है कि नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्र वही ज्यादा हैं जहाॅं जंगल और आदिवासी ज्यादा हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि जंगल नक्सलवादियों की मदद करते हैं। बल्कि समस्या की तह तक जाना होगा। नब्बे के दषक में जब इस मुल्क में नरसिंहाराव और मनमोहन सिंह मार्का उदारीकरण आया जिसे चिदंबरम जैसे हार्वर्ड उत्पादित अर्थषास्त्रियों ने और धार दी तो देष में नए किस्म का पूॅंजीवाद आया और सरकारों की भूमिका भी बदलने लगी। नब्बे के दषक से पहले सरकार की भूमिका कल्याणकारी राज्य की मानी जाती थी। दिखावे के लिए ही सही ‘गरीबी हटाओ’ के नारे लगते थे। लेकिन नरसिंहाराव-वाजपेयी-मनमोहन की तिकड़ी ने सरकारों की भूमिका एक एनजीआंे की बना दी और सरकारें बड़े पूॅंजीपतियों और घोटालेबाजों की जेब की गुलाम बनकर रह गईं और अब तो प्रधानमंत्री जनता को नसीहत भी देने लगे हैं कि वह और महॅंगाई के लिए तैयार रहे।
उदारीकरण की आंधी में औद्योगिकीकरण और तथाकथित विकास के नाम पर किसानों की जमीनें हथियाए जाने लगीं और जंगल से आदिवासियों को बेदखल करके कारखाने लगने लगे। क्या संयोग है कि सारी बड़ी कंपनियों के काॅरपोरेट दफ्तर तो मुंबई और कोलकाता में हैं लेकिन कई कई हजार एकड़ में लगने वाले उनके प्लांट छत्तीसगढ़ और झारखण्ड के जंगलों में लग रहे हैं। बाॅंध बन तो रहे हैं विकास के नाम पर लेकिन यह बाॅंध बलि ले रहे हैं हजारों गांवों के लोगों की। इस विकास और औद्योगिकीकरण से एक आम आदमी को लाभ होने के बजाए नुकसान ही हुआ है।
काफी पहले दो छोटी सी खबरें अलग अलग अखबारों में पढ़ी थीं। एक हाल ही की घटना राजस्थान की थी। उस खबर के मुताबिक कुछ आदिवासियों को पुलिस ने पकड़ा था जिन से लगभग बारह हजार रूपए मूल्य का आंवला पकड़ा गया था। सरकार का तर्क था कि इस आंवले पर अधिकार उस ठेकेदार का है जिसे वन उपज का ठेका दिया गया है। दूसरी खबर के मुताबिक मुकेष अंबानी के जामनगर रिफाइनरी प्लांट में कई सैकड़ा एकड़ में बेहतरीन आम के पेड़ लगे हुए हैं और उन आमों का निर्यात विदेषों को किया जाता है।
अगर आपके पास दृश्टि है तो नक्सलवाद के बढ़ते प्रभाव को समझने और समझाने के लिए यह छोटी सी दो खबरें काफी हैं। राजस्थान की घटना बताती है कि जंगल से आदिवासियों का अधिकार खत्म कर दिया गया है। और अंबानी की खबर बताती है कि जामनगर का प्लांट हजारों लोगों को विस्थापित करके ही स्थापित हुआ होगा और किसानों को उनकी जमीन से बेदखल करके मुकेष अंबानी अब आम की खेती भी कर रहे हैं। इन्हीं विस्थापित लोगों के समर्थन से नक्सलवाद का विस्तार हो रहा है। यह कटु सत्य है और इसे चिदंबरम चाहे स्वीकार करें या न करें - इस विस्थापित आम आदमी के समर्थन से ही नक्सलवाद को षह मिल रही है। खुद सरकारी आंकडें बताते हैं कि वर्श 2006 में 1,509 नक्सली वारदातें हुई। जबकि वर्श 2007 में 1,565 वारदातें हुई। इन वारदातों में वर्श 2006 में 157 सुरक्षा बलों के जवान और 521 नागरिक मारे गए जबकि वर्श 2007 में 236 सुरक्षा बलों के जवान और 460 नागरिक मारे गए।
मीडिया में जो खबरें आ रही हैं, उनके मुताबिक नक्सलवाद प्रभावित राज्यों में पुलिस बल के आधुनिकीकरण के नाम पर कई हजार करोड़ रूपए सरकार खर्च करेगी। जाहिर है इसमें से अधिकांष रूपया अत्याधुनिक हथियारों की खरीद पर खर्च किया जाएगा और एक बड़ी रकम खुफिया नेटवर्क बनाने के नाम पर खर्च होगी, जिसका कोई हिसाब किताब पुलिस अफसरों को नहीं देना होता है। जाहिर है जब तक इस नेटवर्क के नाम पर और हथियारों की खरीद के नाम पर सरकार यह धन मुहैया कराती रहेगी तब तक नक्सलियों के नाम पर आम गरीब आदिवासी पुलिस मुठभेड़ों में मरता रहेगा और प्रतिषोध में इन गरीबों का समर्थन नक्सलियों को ही मिलता रहेगा। सवाल यह भी है कि आतंकवाद नक्सलवाद प्रभावित राज्यों में विकास के नाम पर जो धन राज्यों को दिया जाता है उस धन का क्या प्रयोग होता है? अगर यह धन विकास पर ही खर्च हो रहा है तो वह विकास कहाॅं हो रहा है? अक्सर समाचारपत्रों में रिपोटर््स प्रकाषित होती हैं कि नक्सली अपने क्षेत्रों में ठेकेदारों से लेवी वसूल करते हैं। खबरें सही होती भी हैं। लेकिन यही खबरें प्रष्न भी छोड़ती हैं कि नक्सली यह लेवी किन लोगों से वसूलते हैं? आम गरीब आदमी तो लेवी देता नहीं हैं। लेवी देता है भ्रश्ट ठेकेदार और इंजीनियर। जाहिर है कि अगर यह नक्सलियों को लेवी नहीं भी देगा तो उस पैसे को विकास में नहीं लगाएगा बल्कि अपनी जेब भरेगा।
इसलिए चिदंबरम जी को समझना होगा कि नक्सलवाद विचार है और विचार बन्दूकों से कुचले नहीं जाते। इसके लिए खुद चिदंबरम जी को इस व्यवस्था में सुधार करना होगा और खुद भी एक वैचारिक व्यक्ति बनना होगा। सरकार को एनजीओ की भूमिका छोड़ कर कल्याणकारी राज्य की भूमिका निभानी होगी और विकास का पैमाना बदलना होगा विस्थापन की बुनियाद पर विकास नहीं चलेगा। वरना आप एक कोबाड़ को पकड़ेंगे दस नए कोबाड़ पैदा हो जाएंगे। अभी तक का इतिहास तो यही बताता है कि नक्सली पैदा होता नहीं है बल्कि यह व्यवस्था( जिसके पैरोकार चिदंबरम और मनमोहन हैं) बनाती है। नक्सलियों का हिंसा का रास्ता एकदम गलत है , लेकिन उनका उद्देष्य गलत कहा जाए? कोबाड़ की गिरफ्तारी या छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के नाम पर आदिवासियों का सामूहिक नरसंहार समस्या का हल कभी नहीं बन सकेगा। 
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Oct 03, '09



सादगी पर सियासत
अमलेन्दु उपाध्याय
पिछले दिनों षताब्दी में आम आदमी बनकर या़त्रा करने के बाद राहुल बाबा अचानक लखनऊ के पास बाराबंकी जिले के रामनगर के पास एक दलित गाॅंव में जा पहुॅंचे और लोकसभा चुनाव से पहले जिस तरह उन्होंने एडिसन के बल्ब की तरह ‘कलावती’ का आविश्कार किया था उसी तरह बाराबंकी में उन्होंने ‘जलवर्शा’ की सफल खोज की। कांग्रेसी युवराज राहुल बाबा का अगला टारगेट उत्तर प्रदेष है। इसलिए उनके मीडिया मैनेजर कायदे से मीडिया प्रबंधन कर रहे हैं और उनकी छवि निर्माण में व्यस्त हैं। लिहाजा उनकी सादगी के चर्चे कुछ ज्यादा ही हो रहे हैं और सोने पर सुहागा यह है कि राहुल बाबा बिना बताए दलितों के घर भी पहुॅंच रहे हैं और उनके घर पर भोजन भी कर रहे हैं।
राहुल बाबा के इस महान कार्य की तारीफ होनी चाहिए थी, सो हुई भी और बहन जी को धक्का लगना था सो लगा ही। जाहिर है यह सारी नौटंकी उत्तर प्रदेष में होने के कारण दलित की बेटी बहन मायावती का क्रोधित होना स्वाभाविक है। लेकिन इस तू-तू- मैं-मैं में असल सवाल पीछे छूटता जा रहा है कि राहुल बाबा के इस कलावती-जलवर्शा नाटक से आम दलितों का क्या भला हो रहा है? क्या इस नौटंकी से दलितों की रोजी रोटी के अवसर बढ़ गए? या दलितों को बराबरी का हक मिल गया? अगर ऐसा है या हमारे कांग्रेसी विद्वजन ऐसा मानते हैं कि राहुल बाबा के तूफानी दौरों ने दलितों का जीवन बदल दिया है और अब आम दलित की रोजाना मजदूरी पचास रूपये प्रतिदिन से बढ़कर इक्यावन रूपये प्रतिदिन हो गई है, तब तो मानना पड़ेगा कि राहुल बाबा कांग्रेस के सपूत हैं और जिस काम को इंदिरा और राजीव नहीं कर पाए उसे राहुल बाबा करके अपनी सात पुष्तों के गुनाहों का प्रायष्चित कर रहे हैं।
जहां तक राहुल बाबा की सादगी का सवाल है तो यह सादगी की मुहिम तब षुरू हुई जब विदेषमंत्री एसएम कृश्णा और विदेष राज्य मंत्री षषि थरूर की विलासिता की पोल देष के सामने खुली कि किस तरह से ‘कांग्रेस का हाथ/ आम आदमी के साथ’ का नारा देने वाले कांग्रेसी भद्रजन जनता की मेहनत की कमाई पर गुलछर्रे उड़ा रहे हैं। उसके बाद राहुल बाबा ने षताब्दी में यात्रा की। उनकी षताब्दी यात्रा को मीडिया में प्रचारित किया गया कि राहुल ने आम आदमी की तरह षताब्दी में सफर किया। मुबारक हो! अब भद्र कांग्रेसजनों और उनके मीडियाई पिछलग्गुओं ने आम आदमी की परिभाशा भी बदल दी। अब आम आदमी षताब्दी में यात्रा करता है और विमान की इकाॅनाॅमी क्लास में मवेषी यात्रा करते हैं। इस हिसाब से पैसेंजर ट्रेन में या रेलगाड़ी के जनरल डिब्बे में कीड़े मकोड़े यात्रा करते हैं। यह एक शडयन्त्र है। राहुल की षताब्दी यात्रा के बहाने आम आदमी की परिभाशा बदली जा रही है। राहुल को अगर साधारण आदमी बनने का इतना ही षौक है तो जरा किसी रेल की जनरल बोगी में सफर कर लें आम आदमी बनने का सारा नषा काफूर हो जाएगा।
इससे पहले राहुल बाबा को भी सादगी याद नहीं आई थी अचानक सारे कांग्रेसियों के सिर पर सादगी का भूत सवार हांे गया। राहुल बाबा ने बाराबंकी में ‘दलित ग्राम प्रधान’ के घर पर भोजन तो किया लेकिन वहां से 250 किमी दूर उस गोरखपुर जाने की जहमत नहीं उठा पाए जहां जापानी बुखार से तीन सौ से ज्यादा दलितों के बच्च्ेा पिछले दो माह में ही मारे गए हैं। वैसे राहुल बाबा समझदार हैं इसीलिए वह दलितों के घर जाकर तो खाना खा रहे हैं, लेकिन किसी दलित को दस जनपथ लाकर खाना नहीं खिला रहे हैं यह बात दीगर है कि दस जनपथ पर एक इफ्तार पार्टी पर ही लगभग एक करोड़ रूपया खर्च हो जाता है। क्या राहुल बाबा अपने इस दलित अभियान के तहत अगली यात्रा बिहार की करना पसंद करेंगे जहां वह दलित जाति ‘मुसहरों के टोले में रात गुजारें और उनके साथ भोजन करके यह जानने का प्रयास करेंगे कि यह लोग जिस भोजन (चूहे) को खाने की वजह से मुसहर नाम से जाने जाते हैं उसे और लोग क्यों नहीे खाते?
यह राहुल गांधी का दुर्भाग्य है कि जब वह गांव में गए तो उन्हें लोगों ने पहचाना ही नहीं और उन्हें बताना पड़ा कि वह राजीव गांधी के बेटे हैं। केवल यही एक घटना राहुल की सादगी की पोल पट्टी खोलने के लिए काफी है। क्या राजीव गांधी को कभी बताने की जरूरत पड़ी थी कि वह इंदिरा गांधी के बेटे हैं? या इंदिरा गांधी को कभी बताने की जरूरत पड़ी थी कि वह जवाहर लाल नेहरू की बेटी हैं? लेकिन राहुल गांधी को बताना पड़ रहा है कि वह राजीव गांधी के बेटे हैं।
राहुल अपने नाटक से कांग्रेस के लिए ही मुसीबतें खड़ी कर रहे हैं। अब अगर राहुल दलित इलाकों का विकास न होने के लिए कोस रहे हैं, तो किसको? इस देष पर पांच दषक तक कांग्रेस का षासन रहा। लिहाजा विकास न होने का दोश तो सबसे अधिक कांग्रेस के ही सिर पर है। फिर राहुल सवाल किससे कर रहे हैं?
रहा सवाल राहुल की सादगी का, अगर आज इंदिरा गांधी जीवित होतीं तो क्या कीतीं? मनोहर ष्याम जोषी ने इंदिरा गांधी का एक बार साक्षात्कार लिया था जब इंदिरा जी प्रधानमंत्री थीं। जोषी जी ने कांग्रेसी नेताओं की सादगी पर उनसे सवाल पूछा तो इंदिरा जी ने जबाव दिया-”यह सही है कि कांग्रेस को सादगी और जनसेवा की दिषा में नेतृत्व देना चाहिए लेकिन जो लोग यह समझते हैं कि बॅंगला छोड़कर झोपड़ी में जा बसना चाहिए नेताओं को, वह बात एक दिखावटी षगल सी मालूम होती है। कुछ सहूलियतें जरूरी होती हैं सरकारी कामकाज के लिए, सुरक्षा और गोपनीयता के भी कुछ तकाजे होते हैं। उनके पूरे किए जाने का मतलब षानो-षौकत नहीं है। हाॅं उससे अधिक कुछ होता तो वह ठीक नहीं।“ कुछ समझे राहुल बाबा! आपकी दादी स्व. इंदिरा जी आपकी सादगी को एक दिखावटी षगल बता रही हैं। इसलिए युवराज अब तो आम आदमी बनने का नाटक करके गरीबों की गरीबी का मजाक उड़ाना बन्द करो!!!
(लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं और ‘दि संडे पोस्ट’ में सह संपादक हैं।)








Sep 17, '09



लोकतंत्र की हत्या की पटकथा जगनमोहन के बहाने


अमलेन्दु उपाध्याय
आंधा्र प्रदेष के मुख्यमंत्री वाईएस राजषेखर रेड्डी की असमय मृत्यु के बाद जिस तरह से उनके पुत्र जगनमोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाए जाने की मांग उठी और इसके लिए बाकायदा लॉबिंग की गई उससे कांग्रेस का हाई कमान बहुत चिंतित है। होना भी चाहिए। चिंता कांग्रेस आला कमान को इस बात की है कि अभी तक कांग्रेस में युवराजों को राजतिलक का विषेशाधिकार सिर्फ गांधी-नेहरू खानदान को ही हासिल था। अगर जगनमोहन को आंधा्र की कुर्सी थमा दी गई तब तो राज्यों में राजतिलक की परंपरा चल निकलेगी और ऐसी स्थिति में कांग्रेस को बांधे रखने वाली ताकत गांधी परिवार का रुतबा कम हो जाएगा क्योंकि तब राज्यों के क्षत्रप भी अपने बेटों को सत्ताा सौंपने की मांग करने लगेंगे।
वीरप्पा मोइली ने अभी कहा कि सोनिया गांधी आंधा्र प्रदेष के विशय में फैसला लेंगी। याद होगा कि लोकसभा चुनाव के समय भाजपा ने आरोप जगाया था कि मनमोहन सिंह कठपुतली प्रधानमंत्री हैं और सोनिया सुपर प्रधानमंत्री। उस समय कांग्रेस ने इस आरोप को बहुत बुरा माना था। ठीक इसी तरह मध्य प्रदेष में चुनाव के समय जब भाजपा ने सवाल किया कि कांग्रेस का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार कौन है तब कांग्रेस ने कहा था कि मुख्यमंत्री चुनना विधायकों का अधिकार है और चुनाव बाद नवनिर्वाचित विधायक अपना उम्मीदवार चुनेंगे। अब सवाल यह हो सकता है कि जब मध्य प्रदेष के लिए मुख्यमंत्री चुनना विधायकों ाक विषेशाधिकार है तो आंधा्र प्रदेष के लिए सोनिया का फैसला अंतिम क्यों होगा? और अगर सोनिया ही मुख्यमंत्रियों के भाग्य का फैसला करती हैं तब तो भाजपा का आरोप सही है कि मनमोहन सिंह कठपुतली प्रधाानमंत्री हैं।
लेकिन कांग्रेस आलाकमान की चिंताओं से इतर हमारी चिंता इस प्रकरण पर और सवाल को लेकर है। हमारी चिंता यह है कि इस लॉबिंग के बीच आम कार्यकर्ता कहां खड़ा है और क्या अब कार्यकर्ता का रोल किसी राजनीतिक दल में बचा है और अगर बचा है तो वह रोल क्या है। क्या राजनीति अब कुछ परिवाारों का जन्मसिध्द अधिकार है? क्यों कार्यकर्ता आज निचले पदों पर ही काबिज हैं? हर दल और उसके शिखर नेता चुनाव के मौके पर जिस तरह से अपने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करके टिकट बांटने लगे हैं और जगनमोहन प्रकरण के तरीके से नेतृत्व निर्माण के लिए कार्यकर्ताओं को दरकिनार किया जा रहा है क्या यह लोकतंत्र के लिए षुभ समाचार है? जगनमोहन प्रकरण के बाद यह स्वाभाविक प्रश्न पैदा हो रहा है कि राजनैतिक कार्यकर्ता के लिए भारतीय लोकतंत्र में आखिर कोई जगह बची है या नहीं?
एक समय था जब पार्टियों के मूल्य और आदर्श हुआ करते थे। दल के नेता और नीतियों को देखकर लोग उससे जुड़ते थे। पार्टी भी किसी आदमी को उसके गुण, स्वभाव और चाल चलन के आधार पर पद दिया करती थी। इसलिए परिवारवाद कम हावी था। यह एक कटु सत्य है कि आज केवल उन वामपंथी दलों में परिवारवाद ने जड़े नहीं जमाई हैं जिन वामपंथी दलों के ऊपर आरोप लगते रहे हैं कि उनका सिध्दान्त तो 'सत्ताा बन्दूक की नाल से निकलती है' रहा है। पहले पार्टियां आंदोलन करती थीं और उसके बाद सदस्यता अभियान चलाती थीं। उस समय कॉलेजों से ऐसे विद्यार्थियों को जो पार्टी में आंदोलनों के अगुवा हुआ करते थे, पार्टियां अपना प्रत्याषी बनाया करती थीं। सभी दल युवा, मजदूर, किसान और विभिन्न तबकों से संबन्धित लोगों के संगठन बनाते थे। वरिष्ठ पदों पर बैठे लोगों के बच्चे दल के आदर्शों, नीतियों और मूल्यों से अगर अपरिचित होते थे तो उन्हें पार्टी में पीछे की सीट मिलती थी। मगर अब लोकतंत्र की परंपरा खत्म हो रही है। जिसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि अब पार्टियों के पास मुद्दे नहीं हैं। जनता में जो ज्यादा लोग जागरूक होते थे, पहले जो समाज के लिए कुछ करना चाहते थे, जिनके मन में जोश होता था, जिनका समाज से कुछ सरोकार होता था, और जो मुद्दों को समझना चाहते थे, वही लोग राजनीतिक कार्यकर्ता बनते थे और बाद में नेतृत्व भी संभालते थे। आज पार्टी में शामिल होने वालों का स्वार्थ होता है और पहले कार्यकर्ता को एक ख्याति की आवश्यकता होती थी। अब क्योंकि जातिवाद हावी है तो विद्यार्थी से लेकर आम नागरिक कार्यकर्ता बनने से बचने लगा है। जो नेता जिस समुदाय का होता है वह उसी समुदाय के लोगों को खोजकर कार्यकर्ता के रूप में पार्टी से जोड़ लेता है। अभी तक राजनीतिक कार्यकर्ता की जगह राजनीति में बची हुई थी क्योंकि अभी तक केवल पार्टी के ऊंचे पदों पर ही परिवारवाद हावी था। यह तमाषा है कि जिला और ब्लॉक स्तर पर तो अभी भी छोटे राजनीतिक कार्यकर्ता को ही पदासीन किया जाता है।
पहले कार्यकर्ता नेता चुनते थे। मगर अब नेता जो चाहता है वही होता है। इसलिए आम कार्यकर्ता कमजोर हुआ है। इसके अलावा जिसके पास पैसा नहीं है उसे कोई पद नहीं दिया जाता। क्योंकि पहले देहात और गांव में वहां के विकास कार्यो को हल कराने के लिए पार्टियों से जुड़ते थे मगर अब दल वहां के लिए पैसे से कार्यकर्ता खरीद लेते हैं। अब असली राजनीतिक कार्यकर्ता पसोपेश में हैं कि वह क्या करे? ईमानदारों को या तो अब चाटुकारों की तरह पार्टी के बड़े नेताओं की बात मान कर चलना होता है या फिर वह राजनीति छोड़कर घर बैठ जाता है। एक समय में गांव का कार्यकर्ता भी बड़े से बड़े नेता को साफ-साफ मुद्दों और नीतियों पर घेर लिया करते थे। मगर अब स्थिति यह है कि समाजवादी पार्टी परमाणु करार पर यू टर्न लेते हुए रात ही रात में कांग्रेस का समर्थन करने का फैसला ले लेती है और उसके बड़े से बड़े नेताओं को यह मालूम ही नहीं पड़ पाता कि ऐसा फैसला कहां ले लिया गया। यही कारण है कि जब सपा उत्तार प्रदेष में मायावती के खिलाफ आंदोलन का बिगुल बजाती है तो उसे कार्यकर्ता नहीं मिल पाते।
आदमी अपने कर्मों से राजनीतिक कार्यकर्ता बनता है। क्योंकि उसे अपने लक्ष्य के बारे में ठीक से पता होता है और उसी दिशा में वह चलना भी चाहता है। उसे हर समय एक अच्छे मंच की की तलाश भी रहती है। तो उसे राजनीति में लाने के लिए लोग आगे आ जाते हैं। ग्रामीण अंचलों में जो गांव का बच्चा समझदार होता था, पढ़ने-लिखने के बाद वह वहां की समस्याओं के लिए कदम उठाता था तो गांव के लोग उसे प्रोत्साहन देते थे। गांव के सहारे ही वह आगे बढ़ने लगता था। जब बड़ी पार्टियों के नेताओं की नजर उस पर पड़ती थी तो उसे पार्टी में शामिल हो जाने के लिए आमंत्रित करते थे। गांव के लोग भी उसे प्रेरित करते थे कि वह उनके लिए कुछ करेगा तो वह बिना किसी हिचक के उसका समर्थन करते थे। यही कारण था िकवह कांग्रेस जहां आज जगनमोहन पैदा हो रहे हैं उसी कांग्रेस में एक बैण्ड मास्टर सीताराम केसरी कांग्रेस अध्यक्ष के पद तक पहुंचा। क्या आज कल्पना की जा सकती है कि कोई सीताराम केसरी कांग्रेस में पैदा होगा?
जो लोग देश की तस्वीर बदलने के लिए घर से गुड़ खाकर मीलों पैदल चलते थे वही असली राजनीतिक कार्यकर्ता होते थे। आज भी जो वंचितों, भौतिक साधनों, अवसरों को आम जनता को देने के लिए उसके दिल में दर्द होता है वही राजनीतिक कार्यकर्ता बनता है। आज भी ग्रामीण और विद्यार्थी वर्ग ही सबसे ज्यादा राजनीति में आता है और पहले भी आया करता था। पहले भी वे विधायक बनने के लिए नहीं आते थे और न ही कोई पदाधिकारी बनने के लिए। मगर अब समय बदल गया है अब दूसरी तरह का कार्यकर्ता भी बन रहा है। यह सबसे पहले किसी पद पर इसलिए बैठना चाहता है कि वहां से कुछ अर्जित कर सके। और उसे यह सिखाया है जगनमोहन जैसों ने।
आज राजनीति का संदर्भ और उद्देश्य दोनों बदल रहे हैं। इसका लोगों के राजनीतिक निर्माण प्रक्रिया में असर पड़ रहा है। 1990 के उदारीकरण के दौर आर्थिक व सामाजिक अन्यायों के खिलाफ आवाज को उभारना था। इसलिए राजनैतिक कार्यकर्ता बनने की जरूरत होती थी। लोग सामाजिक सरोकारों के लिए समर्पित थे। यह समर्पण दक्षिणपंथी, मध्यमार्गी और वामपंथी सभीं के लिए ही बराबर लागू था। जो लोग इनके महत्व को समझते थे वे ही राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में जन्म लेते थे। पूंजीपति अपने दल की विचारधाराओं को अपनाकर ही राजनीति से जुड़ते थे। मगर 1990 के बाद से राजनैतिक मूल्यों में बदलाव आया है। आज उस तरह के राजनीतिक कार्यकर्ता बन भी नहीं रहे हैं और जो सही कार्यकर्ता हैं वह हाषिए पर धाकेल दिए गए हैं। बिल्डर, माफिया और पूंजीपति मिलकर राजनीतिक दलों का एजेन्डा तय कर रहे हैं। अगर अनिल अंबानी और मुकेष अंबानी के चहेते कांग्रेस में हें तो भाजपा में भी हैं। यही कारण है कि अगर जगनमोहन को मुख्यमंत्री बनाए जाने के लिए आंधा्र के बिल्डर्स लॉबिंग करते हैं तो समाजवादी पार्टी को फिरोजाबाद में लोकसभा चुनाव लड़ाने के लिए मुलायम के पुत्र अखिलेष की पत्नी ही उम्मीदवार मिलती हैं और सारे कार्यकर्ता दरकिनार कर दिए जाते हैं। वे अध्यापक, छात्र और पढ़े लिखे लोग जो व्यवस्था की कमियों से दुखी होते थे भ्रष्टाचार को खत्म करने के अरमान मन में पाले रहते थे वे अब हाषिए पर हैं और आने वाला समय या तो जगनमोहन, चौटाला, राबड़ी, डिम्पल यादव जैसों का होगा या फिर अनु टण्डन, निषिकांत और नाथवानी जैसे पूंजीपतियों के नुमाइन्दों का। जगनमोहन प्रकरण लोकतंत्र की हत्या की पटकथा लिखे जाने की गवाही दे रहा है।
( लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं और 'दि संडे पोस्ट' में सह संपादक हैं।)








Aug 21, '09



राह भटके योग के ब्राण्ड रामदेव
राह भटके योग के ब्राण्ड रामदेव

- अमलेन्दु उपाध्याय -
२०१४ बहुत नजदीक है, जिसके चलते योग गुरू कहलाए जाने वाले बाबा रामदेव बहुत जल्दी में हैं। चूंकि साढे चार साल का समय बचा है और देश बहुत बडा है। इसीलिए बाबा रामदेव जल्दबाजी में आदि शंकराचार्य के सिद्धान्त ”ब्रह्म सत्यम, जगत मिथ्या“ को भारत की सदियों की गुलामी का कारण बता रहे हैं, शास्त्रों में लिखी संन्यास की परिभाषा को गलत बता रहे हैं, भ्रष्टाचारियों की जमात में लालू प्रसाद यादव का नाम लेने पर कुपित हो रहे हैं, उन्हें अपने असली नाम ’रामकृष्ण यादव‘ के नाम से पुकारे जाने पर भी आपत्ति है और वह अभिनेत्रियों को वेश्या बता रहे हैं।

बबा रामदेव पिछली दस अगस्त को नौएडा में थे। साप्ताहिक समाचार पत्र ’दि संडे पोस्ट‘ के कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम ’टॉक ऑन टेबल‘ में उन्होंने शिरकत की और अपने एजेन्डे पर खुलकर बोले। रौ में बोलते हुए बाबा कह गए कि ”शास्त्रों में संन्यास की परिभाषा ही गलत लिखी है।’ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या‘ वैसा संन्यास नहीं है।“ बाबा इतने पर ही नहीं रूके। जब ’नई दुनिया‘ के राजनीतिक संपादक विनोद अग्निहोत्री ने उनसे पूछना चाहा कि ” यह जो ’ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या‘ का सिद्धान्त दिया गया…“ तो उनका प्रश्न पूरा सुने बिना बात बीच में ही काट कर बाबा बोले- ”इसी ने देश का बहुत नुकसान किया है। आज भारत का जो आघ्यात्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक क्षरण हुआ है, वह इसी से हुआ है। सात्विक लोगों ने ’ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या‘ कहकर जैविक संसाधनों का संचय नहीं किया। अधर्म, असत्य, अन्याय, शोषण, अपराध, दुराचार, व्यभिचार का विरोध नहीं किया। हम ठीक हैं तो , बाकी चीजों से हमें क्या लेना देना। इस दर्शन ने भारत को सदियों की गुलामी की तरफ ढकेल दिया।“

जब अगले दिन एक समाचार पत्र में यह खबर छपी कि बाबा रामदेव ने आदि शंकराचार्य के सिद्धान्त को चुनौती दी, तो बखेडा खडा होने पर बाबा ने कह दिया कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा। लेकिन ’दि संडे पोस्ट‘ ने पूरी बात अक्षरशः प्रकाशित कर दी। अब बाबा के पास कहने को क्या है?

अब बाबा से प्रश्न पूछा जा सकता है कि अगर ’ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या‘ सिद्धान्त गलत है और शास्त्रों में लिखी हुई संन्यास की परिभाषा गलत है तब बाबा रामदेव संन्यासियों की वर्दी भगवा कपडे पहने क्यों घूम रहे हैं? क्या बाबा को जो मान सम्मान, धन देश भर से मिल रहा है वह एक संन्यासी होने के कारण नहीं मिल रहा है? और अगर बाबा संन्यास के लिए घर-बार छोडना जरूरी नहीं मानते हैं तो उन्हें उनके असली नाम ’रामकृष्ण यादव‘ पुकारे जाने पर आपत्ति क्यों है और क्यों उन्होंने अपना घर-बार छोडकर संन्यासियों की परंपरा के अनुसार बाबा शंकरदेव से दीक्षा क्यों ली?

बाबा रामदेव योग के जरिए तनाव, ब्लड प्रेशर, डाइबिटीज, कैंसर, सबकी दवा बट रहे हैं लेकिन वह नुस्खा नहीं बता रहे हैं जिस नुस्खे से बाबा पिछले दस वर्षों में २७०० करोड रूपए के आदमी बन गए? बाबा इस सबके बीच भ्रष्टाचारियों के खिलाफ आंदोलन करने की बात करते हैं लेकिन लालू प्रसाद यादव उनके परम शिष्यों में से एक हैं और बाबा इस बात पर बिफर पडते हैं जब टॉक ऑन टेबल में कोई उनसे लालू के विषय में पूछ लेता है। याद है न कि बाबा ने चुनाव के दौरान भाजपा के विदेशों में जमा धन वापिस लाने के नारे में ताल से ताल मिलाई थी। लेकिन आश्चर्य है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लडने का दावा करने वाले बाबा की दिव्य फार्मेसी के मजदूर न्यूनतम मजदूरी दिलाए जाने की माँग करते हैं। हां बाबा को इस बात का श्रेय दिया जा सकता है कि जिस तेजी से कई बडी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अपने प्रोडक्ट्स को लोकप्रिय नहीं बना पाईं बाबा ने बहुत कम समय में योग की जबर्दस्त मार्केटिंग की और पिछले एक दशक में योग जबर्दस्त प्रोडक्अ बन कर उभरा है। बाबा संन्यासी भी हैं, योगी भी हैं, आयुर्वेद के डॉक्टर भी हैं और जिसे कबीर ने ’माया महाठगिनी‘ कहा था उस माया के बडे साधक भी हैं और उनका संघर्ष भी भ्रष्टाचार के खिलाफ है। है न हैरानी वाली बात! फिर भी बाबा का योग धर्मशास्त्रों में बताया गया योग नहीं है। बाबा स्वयं कहते हैं कि ”योग को धर्म सम्प्रदायों, पूजा पद्धतियों से जोडने का कोई मतलब नहीं है।….ओम कोई मजहबी शब्द नहीं है।“ बाबा सदियों से तपस्या करते आ रहे भारतीय मनीषियों की तपस्या पर एक झटके में पानी फेर देते हैं

इसी काय्रक्रम में बाबा रामदेव ने सारे पढे लिखे लोगों को अपसंस्कृति वाला घोषित कर दिया। बाबा ने कहा कि- ” आप सुबह से शाम तक जो भी देखते हो उसको अपसंस्कृति के तौर पर नहीं ले रहे हो। उसे सभ्यता के तौर पर ले रहे हो। वे तो पढे लिखे लोग हैं, वे तो ऐसा करेंगे। इसे ही करने के लिए तो वे पैदा हुए हैं। १७६० में इस नशा का व्यापार अंग्रेजों ने शुरू किया था। उससे पहले भारत बहुत अच्छा था। १७६० में इसको वैधानिकता दी गई नशा और वासना को। अंतर क्या है पैसे के लिए एक कोठे में बैठकर अपने शरीर को बेचती है। एक सेट और पर्दे पर बैठकर शील और शरीर को। अंतर क्या है? नाम का ही तो अंतर है। एक को वेश्या कहते हैं दूसरी को अभिनेत्री। अंतर क्या है? खाली नाम का अंतर है।“

हैं न बाबा महान जो सारे पढे लिखे लोगों को बता रहे हैं कि वे तो पैदा ही अपसंस्कृति फैलाने के लिए हुए हैं और अभिनेत्रियां वेश्या हैं। बाबा का अभिनेत्रियों को वेश्या कहना नारी जाति का अपमान है। बाबा मद में अन्धे होकर अपना विवेक खो बैठे हैं और भूल जा रहे हैं कि वह क्या क्या बक रहे हैं। अगर अभिनेत्रियां वेश्या हैं तो पैसे के लिए अध्यात्म, धर्म, योग और लोगों की भावनाओं को बेचने वाला क्या है? आप तय करें।


(लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं और ’दि संडे पोस्ट‘ में सह-संपादक हैं।)














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