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Nov 13, '09



पत्रकारिता के शिखर पुरुष प्रभाष जोशी
पत्रकारिता के शिखर पुरुष प्रभाष जोशी

हिन्दी पत्रकारिता के भीष्म पितामह प्रभाष जोशी हमेशा के लिए इस दुनिया को छोड़ गए हैं। उनके साथ ही 'मिशन पत्रकारिता' के एक पूरे युग का अंत हो गया है। प्रभाषजी पत्रकारिता के भीष्म पितामह जरूर थे लेकिन जब-जब पत्रकारिता की द्रोपदी की लाज लुटी वह द्रोपदी की रक्षा के लिए आगे बढ़कर आए। अपने जीवन के अंतिम क्षणों में भी वह अखबारों में कम होती संपादक की भूमिका और अखबार मालिकों के पैसे लेकर खबरें बेचने के कारनामों के खिलाफ लड़ते रहे

अमलेन्दु उपाध्याय
अब नहीं रहे। यह खबर सुनने में अटपटी लगती है पर है सच। प्रभाषजी के साथ पत्रकारिता के एक पूरे युग का अन्त हो गया और उनका यूं अचानक चले जाना उन लोगों के लिए किसी वज्रपात से कम नहीं है जो पत्रकारिता को एक मिशन मानकर और आम आदमी का सच्चा प्रतिनिधिा मानकर काम करते हैं।
प्रभाषजी, राजेन्द्र माथुर के बाद उस मायने में सच्चे पत्रकार थे जो पत्रकारिता के जरिए सार्थक दिशा में समाज बदलने की चाहत रखते थे और कुल मिलाकर खांटी पत्रकार थे। ऐसा भी नहीं है कि राजेन्द्र माथुर या प्रभाषजी के अलावा समकालीन दौर में पत्रकारिता के क्षेत्र में बड़े नाम वालों की कोई कमी हो। अज्ञेय, धार्मवीर भारती, कमलेश्वर, रघुवीर सहाय कुछ ऐसे लोग रहे जिन्होंने पत्रकारिता के नए मानदण्ड स्थापित किए। लेकिन प्रभाषजी को एक बात जो बाकियों से अलग कर उन्हें राजेन्द्र माथुर की श्रेणी में रखती है, वो यह है कि प्रभाषजी सौ फीसदी पत्रकार थे। वह न तो साहित्य में नाम कमाने के बाद पत्रकारिता में आए थे और न ही साहित्य में विफल होने के बाद। जिस तरह रघुवीर सहाय की कविता को आम आदमी का रोजनामा तथा 'राजनीति और विरोधा' की कविता कहा जाता है ठीक उसी तरह प्रभाषजी की पत्रकारिता आम आदमी के दुख दर्द के लिए थी। प्रभाषजी ने अपने लगभग चार दशक की पत्रकारिता के दौर में पत्रकारों की जो एक पौधा लगाई वह भी सौ फीसदी सच्चे पत्रकारों की थी। यह प्रभाषजी का ही कौशल था कि उनकी टीम में अगर राम बहादुर राय, बनवारी थे तो अभय कुमार दुबे, अंबरीश कुमार जैसे लोग भी थे। आलोक तोमर, प्रदीप सिंह, सुशील कुमार सिंह, निरंजन परिहार, उमेश जोशी, ओम थानवी प्रभातरंजन दीन जैसे लोग प्रभाषजी की ही देन हैं।
मेरा प्रभाषजी से सीधाा कभी कोई वास्ता तो नहीं रहा लेकिन एक खुशी है कि उनके जीवन की आखिरी मुहिम, जिसमें उन पर काफी हमले भी हुए, में मैं भी शामिल रहा। विगत लोकसभा चुनाव में हिन्दी पट्टी में कई बड़े अखबारों ने पैसे लेकर खबरें छापीं। प्रभाषजी ने बाकायदा अखबारों के इस कारनामे के खिलाफ आंदोलन चलाया। उस वक्त मैं रामबहादुर राय जी द्वारा संपादित पत्रिका 'प्रथम प्रवक्ता' में था। राय साहब ने इस मुद्दे पर देश भर से जानकारी इकट्ठा करने और आई हुई खबरों को संपादित करने की जिम्मेदारी मेरे ऊपर ही डाली। इस दौरान एक घटना हुई जो प्रभाषजी के साथ साथ राय साहब की पत्रकारिता की भी पहचान कराती है। हमारे झारखंड के संवाददाता की खबर आई कि 'प्रभात खबर' में भी खबरें विज्ञापन के रूप में छपीं लेकिन उनके नीचे और ऊपर पीके मीडिया इनीशिएटिव लिखकर यह बताने का प्रयास किया गया कि यह खबर नहीं है।
ऐसे समय संकट इस बात का था कि 'प्रभात खबर' के संपादक हरिवंशजी, राय साहब के भी मित्र हैं और प्रभाषजी से भी उनका नजदीकी संबंधा था। मैंने राय साहब से कहा कि झारखंड से ऐसी खबर आई है क्या देना उचित रहेगा? राय साहब ने कहा कि जरूर दिया जाएगा। अगर खबर आई है तो वह किसी ने भी किया हो दिया जाएगा। इसके बाद सारी खबरें प्रभाषजी के भी पास गईं, जिनके आधाार पर उन्होंने अपना लेख लिखा। तभी अचानक 24 जून को मैंने प्रथम प्रवक्ता छोड़ दिया। लेकिन जब जुलाई के पहले हफ्ते में 'प्रथम प्रवक्ता' का अंक आया तो सारी खबरें ज्यों की त्यों अक्षरश: वैसी ही प्रकाशित हुईं जैसी मैंने संपादित की थीं। यह था प्रभाषजी का एक पत्रकार का रूप। अगर प्रभाषजी चाहते तो झारखंड की रिपोर्ट पर सवाल कर सकते थे, राय साहब से उसे न देने के लिए भी कह सकते थे। पर मिशन में मित्रता आड़े नहीं आई।
इसी तरह एक पूरी की पूरी पीढ़ी प्रभाषजी को पढ़ सुनकर ही पत्रकारिता में जवान हुई है और उसे पत्रकारिता के यह संस्कार कि जिस समय तुम पत्रकार हो उस समय तुम्हारा पहला और आखिरी धार्म पत्रकारिता ही है, प्रभाषजी ने ही दिए। इसलिए आज पत्रकारिता का जो वीभत्स कारपोरेटीक(त स्वरूप सामने आ रहा है उसमें प्रभाषजी हम जैसे उन पत्रकारों के रक्षा कवच थे जो पत्रकारिता को मिशन मानते हैं कमीशन नहीं। जाहिर है उनके जाने के बाद पत्रकारिता का स्वरूप और बदलेगा और नई चुनौतियां भी होंगी लेकिन प्रभाषजी सच्चे पत्रकारों के लिए प्रकाश स्तम्भ का काम करते रहेंगे।
amalendu@thesundaypost.in
amalendu.upadhyay@gmail.com 


[ Published in “The Sunday Post” 22nd November issue]









Oct 10, '09




कोबाड़ का रास्ता!
अमलेन्दु उपाध्याय 

पिछले महीने गिरफ्तार किए गए नकसली नेता कोबाड़ गांधी की दिल्ली में गिरफ्तारी से देष में एक बहस छिड़ गई है। पहले जब नक्सल समस्या पर बहस होती थी तब इसे कुंठित युवाओं की सत्ता लालसा या भटके हुए वामपंथी अतिवादी बताकर इसे कानून व्यवस्था का प्रष्न बता दिया जाता था और राजकाज चलता रहता था। लेकिन इस बार बहस कुछ नए किस्म की है।
कोबाड़ गांधी इसके लिए बधाई के पात्र हैं कि उनके बहाने ही सही नक्सलवाद एक बार फिर चर्चा में है और उनकी गिरफ्तारी के बहाने ही सही, माओवादी आन्दोलन को फिर से समझने की जरूरत महसूस की जाने लगी है। भले ही गृह मंत्री पी. चिदंबरम नक्सलवाद को सबसे बड़ा खतरा बता रहे हों लेकिन उनकी सरकार में ही लोग उनके इस विचार से पूर्णतया सहमत नहीं दिखते हैं। स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यह कहने को मजबूर हो गए हैं कि नक्सलवाद सिर्फ कानून व्यवस्था का मामला नहीं है। और यह बात सही भी है। कानून व्यवस्था के मसले दषकों तक नहीं चला करते हैं। नक्सलवाद इस देष में लगभग तीन दषक से भी ज्यादा समय से पनप रहा है और इसका प्रभाव कम होने के बजाए लगातार बढ़ता ही गया है। किसी भी आतंकवादी आन्दोलन के पूरे दौर में जितने आतंकवादी मारे जाते होंगे उससे कहीं ज्यादा नक्सली हर साल पुलिस के हाथों मारे जाते हैं। अकेले छत्तीसगढ़ में एक वर्श में चार सौ के आसपास कथित नक्सली मारे गए हैं। लेकिन कोई तो बात है जो नक्सलवाद का जुनून बढ़ता ही जाता है।
दिल्ली की गद्दी पर बैठे हुक्मरानों और पूॅंजीवादी रुझान के बुद्धिजीवियों के माथे पर इस प्रष्न को लेकर चिंता की लकीरें गहरी हो गई हैं कि आखिर क्या बात है कि कोबाड़ गांधी जैसे लोग अपने कैरियर, घरबार और व्यापार को छोड़कर इस तरह के आन्दोलन से न केवल जुड़ जाते हैं बल्कि अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देते हैं। ताज्जुब इसलिए भी होता है कि अतिवामपंथी आंदोलन से जुड़ने वाले लोग न तो धर्म के पहरूए हैं, न जेहादी हैं, न जातिवादी आन्दोलन से निकलकर आए हैं। फिर उन्हें यह जुनून कहाॅं से मिलता है?
यहाॅं यह याद रखना चाहिए कि कोबाड़ गांधी इस तरह का पहला उदाहरण नहीं हैं, जिन्होंने माक्र्सवाद के सिद्धान्तों के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया हो। इससे पहले भी ईएमएस नंबूदरीपाद जैसे लोग भी हुए हैं जिनका राजघराने से ताल्लुक रहा और उनकी जमींदारी देष में सर्वाधिक मालगुजारी वसूलने वाली रियासत समझी जाती थी। लेकिन नम्बूदरीपाद अपनी सारी संपत्ति कम्युनिस्ट पार्टी को सौंपकर पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए थे। कोबाड़ गांधी के जुनून को एक और तरीके से समझा जा सकता है। गौतम बुद्ध भी अपना सारा राजपाट छोड़कर दुख के निदान की तलाष में ही भिक्षु बन गए थे। लेकिन बुद्ध का रास्ता अध्यात्म का था, पलायन का था और कोबाड़ ने जो रास्ता चुना, वह है तो बुद्ध के समानान्तर ही लेकिन वह विचार का रास्ता है, संघर्श का रास्ता है, पलायन का नहीं।
यह भी बात गौेर करने लायक है कि नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्र वही ज्यादा हैं जहाॅं जंगल और आदिवासी ज्यादा हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि जंगल नक्सलवादियों की मदद करते हैं। बल्कि समस्या की तह तक जाना होगा। नब्बे के दषक में जब इस मुल्क में नरसिंहाराव और मनमोहन सिंह मार्का उदारीकरण आया जिसे चिदंबरम जैसे हार्वर्ड उत्पादित अर्थषास्त्रियों ने और धार दी तो देष में नए किस्म का पूॅंजीवाद आया और सरकारों की भूमिका भी बदलने लगी। नब्बे के दषक से पहले सरकार की भूमिका कल्याणकारी राज्य की मानी जाती थी। दिखावे के लिए ही सही ‘गरीबी हटाओ’ के नारे लगते थे। लेकिन नरसिंहाराव-वाजपेयी-मनमोहन की तिकड़ी ने सरकारों की भूमिका एक एनजीआंे की बना दी और सरकारें बड़े पूॅंजीपतियों और घोटालेबाजों की जेब की गुलाम बनकर रह गईं और अब तो प्रधानमंत्री जनता को नसीहत भी देने लगे हैं कि वह और महॅंगाई के लिए तैयार रहे।
उदारीकरण की आंधी में औद्योगिकीकरण और तथाकथित विकास के नाम पर किसानों की जमीनें हथियाए जाने लगीं और जंगल से आदिवासियों को बेदखल करके कारखाने लगने लगे। क्या संयोग है कि सारी बड़ी कंपनियों के काॅरपोरेट दफ्तर तो मुंबई और कोलकाता में हैं लेकिन कई कई हजार एकड़ में लगने वाले उनके प्लांट छत्तीसगढ़ और झारखण्ड के जंगलों में लग रहे हैं। बाॅंध बन तो रहे हैं विकास के नाम पर लेकिन यह बाॅंध बलि ले रहे हैं हजारों गांवों के लोगों की। इस विकास और औद्योगिकीकरण से एक आम आदमी को लाभ होने के बजाए नुकसान ही हुआ है।
काफी पहले दो छोटी सी खबरें अलग अलग अखबारों में पढ़ी थीं। एक हाल ही की घटना राजस्थान की थी। उस खबर के मुताबिक कुछ आदिवासियों को पुलिस ने पकड़ा था जिन से लगभग बारह हजार रूपए मूल्य का आंवला पकड़ा गया था। सरकार का तर्क था कि इस आंवले पर अधिकार उस ठेकेदार का है जिसे वन उपज का ठेका दिया गया है। दूसरी खबर के मुताबिक मुकेष अंबानी के जामनगर रिफाइनरी प्लांट में कई सैकड़ा एकड़ में बेहतरीन आम के पेड़ लगे हुए हैं और उन आमों का निर्यात विदेषों को किया जाता है।
अगर आपके पास दृश्टि है तो नक्सलवाद के बढ़ते प्रभाव को समझने और समझाने के लिए यह छोटी सी दो खबरें काफी हैं। राजस्थान की घटना बताती है कि जंगल से आदिवासियों का अधिकार खत्म कर दिया गया है। और अंबानी की खबर बताती है कि जामनगर का प्लांट हजारों लोगों को विस्थापित करके ही स्थापित हुआ होगा और किसानों को उनकी जमीन से बेदखल करके मुकेष अंबानी अब आम की खेती भी कर रहे हैं। इन्हीं विस्थापित लोगों के समर्थन से नक्सलवाद का विस्तार हो रहा है। यह कटु सत्य है और इसे चिदंबरम चाहे स्वीकार करें या न करें - इस विस्थापित आम आदमी के समर्थन से ही नक्सलवाद को षह मिल रही है। खुद सरकारी आंकडें बताते हैं कि वर्श 2006 में 1,509 नक्सली वारदातें हुई। जबकि वर्श 2007 में 1,565 वारदातें हुई। इन वारदातों में वर्श 2006 में 157 सुरक्षा बलों के जवान और 521 नागरिक मारे गए जबकि वर्श 2007 में 236 सुरक्षा बलों के जवान और 460 नागरिक मारे गए।
मीडिया में जो खबरें आ रही हैं, उनके मुताबिक नक्सलवाद प्रभावित राज्यों में पुलिस बल के आधुनिकीकरण के नाम पर कई हजार करोड़ रूपए सरकार खर्च करेगी। जाहिर है इसमें से अधिकांष रूपया अत्याधुनिक हथियारों की खरीद पर खर्च किया जाएगा और एक बड़ी रकम खुफिया नेटवर्क बनाने के नाम पर खर्च होगी, जिसका कोई हिसाब किताब पुलिस अफसरों को नहीं देना होता है। जाहिर है जब तक इस नेटवर्क के नाम पर और हथियारों की खरीद के नाम पर सरकार यह धन मुहैया कराती रहेगी तब तक नक्सलियों के नाम पर आम गरीब आदिवासी पुलिस मुठभेड़ों में मरता रहेगा और प्रतिषोध में इन गरीबों का समर्थन नक्सलियों को ही मिलता रहेगा। सवाल यह भी है कि आतंकवाद नक्सलवाद प्रभावित राज्यों में विकास के नाम पर जो धन राज्यों को दिया जाता है उस धन का क्या प्रयोग होता है? अगर यह धन विकास पर ही खर्च हो रहा है तो वह विकास कहाॅं हो रहा है? अक्सर समाचारपत्रों में रिपोटर््स प्रकाषित होती हैं कि नक्सली अपने क्षेत्रों में ठेकेदारों से लेवी वसूल करते हैं। खबरें सही होती भी हैं। लेकिन यही खबरें प्रष्न भी छोड़ती हैं कि नक्सली यह लेवी किन लोगों से वसूलते हैं? आम गरीब आदमी तो लेवी देता नहीं हैं। लेवी देता है भ्रश्ट ठेकेदार और इंजीनियर। जाहिर है कि अगर यह नक्सलियों को लेवी नहीं भी देगा तो उस पैसे को विकास में नहीं लगाएगा बल्कि अपनी जेब भरेगा।
इसलिए चिदंबरम जी को समझना होगा कि नक्सलवाद विचार है और विचार बन्दूकों से कुचले नहीं जाते। इसके लिए खुद चिदंबरम जी को इस व्यवस्था में सुधार करना होगा और खुद भी एक वैचारिक व्यक्ति बनना होगा। सरकार को एनजीओ की भूमिका छोड़ कर कल्याणकारी राज्य की भूमिका निभानी होगी और विकास का पैमाना बदलना होगा विस्थापन की बुनियाद पर विकास नहीं चलेगा। वरना आप एक कोबाड़ को पकड़ेंगे दस नए कोबाड़ पैदा हो जाएंगे। अभी तक का इतिहास तो यही बताता है कि नक्सली पैदा होता नहीं है बल्कि यह व्यवस्था( जिसके पैरोकार चिदंबरम और मनमोहन हैं) बनाती है। नक्सलियों का हिंसा का रास्ता एकदम गलत है , लेकिन उनका उद्देष्य गलत कहा जाए? कोबाड़ की गिरफ्तारी या छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के नाम पर आदिवासियों का सामूहिक नरसंहार समस्या का हल कभी नहीं बन सकेगा। 
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Oct 03, '09



सादगी पर सियासत
अमलेन्दु उपाध्याय
पिछले दिनों षताब्दी में आम आदमी बनकर या़त्रा करने के बाद राहुल बाबा अचानक लखनऊ के पास बाराबंकी जिले के रामनगर के पास एक दलित गाॅंव में जा पहुॅंचे और लोकसभा चुनाव से पहले जिस तरह उन्होंने एडिसन के बल्ब की तरह ‘कलावती’ का आविश्कार किया था उसी तरह बाराबंकी में उन्होंने ‘जलवर्शा’ की सफल खोज की। कांग्रेसी युवराज राहुल बाबा का अगला टारगेट उत्तर प्रदेष है। इसलिए उनके मीडिया मैनेजर कायदे से मीडिया प्रबंधन कर रहे हैं और उनकी छवि निर्माण में व्यस्त हैं। लिहाजा उनकी सादगी के चर्चे कुछ ज्यादा ही हो रहे हैं और सोने पर सुहागा यह है कि राहुल बाबा बिना बताए दलितों के घर भी पहुॅंच रहे हैं और उनके घर पर भोजन भी कर रहे हैं।
राहुल बाबा के इस महान कार्य की तारीफ होनी चाहिए थी, सो हुई भी और बहन जी को धक्का लगना था सो लगा ही। जाहिर है यह सारी नौटंकी उत्तर प्रदेष में होने के कारण दलित की बेटी बहन मायावती का क्रोधित होना स्वाभाविक है। लेकिन इस तू-तू- मैं-मैं में असल सवाल पीछे छूटता जा रहा है कि राहुल बाबा के इस कलावती-जलवर्शा नाटक से आम दलितों का क्या भला हो रहा है? क्या इस नौटंकी से दलितों की रोजी रोटी के अवसर बढ़ गए? या दलितों को बराबरी का हक मिल गया? अगर ऐसा है या हमारे कांग्रेसी विद्वजन ऐसा मानते हैं कि राहुल बाबा के तूफानी दौरों ने दलितों का जीवन बदल दिया है और अब आम दलित की रोजाना मजदूरी पचास रूपये प्रतिदिन से बढ़कर इक्यावन रूपये प्रतिदिन हो गई है, तब तो मानना पड़ेगा कि राहुल बाबा कांग्रेस के सपूत हैं और जिस काम को इंदिरा और राजीव नहीं कर पाए उसे राहुल बाबा करके अपनी सात पुष्तों के गुनाहों का प्रायष्चित कर रहे हैं।
जहां तक राहुल बाबा की सादगी का सवाल है तो यह सादगी की मुहिम तब षुरू हुई जब विदेषमंत्री एसएम कृश्णा और विदेष राज्य मंत्री षषि थरूर की विलासिता की पोल देष के सामने खुली कि किस तरह से ‘कांग्रेस का हाथ/ आम आदमी के साथ’ का नारा देने वाले कांग्रेसी भद्रजन जनता की मेहनत की कमाई पर गुलछर्रे उड़ा रहे हैं। उसके बाद राहुल बाबा ने षताब्दी में यात्रा की। उनकी षताब्दी यात्रा को मीडिया में प्रचारित किया गया कि राहुल ने आम आदमी की तरह षताब्दी में सफर किया। मुबारक हो! अब भद्र कांग्रेसजनों और उनके मीडियाई पिछलग्गुओं ने आम आदमी की परिभाशा भी बदल दी। अब आम आदमी षताब्दी में यात्रा करता है और विमान की इकाॅनाॅमी क्लास में मवेषी यात्रा करते हैं। इस हिसाब से पैसेंजर ट्रेन में या रेलगाड़ी के जनरल डिब्बे में कीड़े मकोड़े यात्रा करते हैं। यह एक शडयन्त्र है। राहुल की षताब्दी यात्रा के बहाने आम आदमी की परिभाशा बदली जा रही है। राहुल को अगर साधारण आदमी बनने का इतना ही षौक है तो जरा किसी रेल की जनरल बोगी में सफर कर लें आम आदमी बनने का सारा नषा काफूर हो जाएगा।
इससे पहले राहुल बाबा को भी सादगी याद नहीं आई थी अचानक सारे कांग्रेसियों के सिर पर सादगी का भूत सवार हांे गया। राहुल बाबा ने बाराबंकी में ‘दलित ग्राम प्रधान’ के घर पर भोजन तो किया लेकिन वहां से 250 किमी दूर उस गोरखपुर जाने की जहमत नहीं उठा पाए जहां जापानी बुखार से तीन सौ से ज्यादा दलितों के बच्च्ेा पिछले दो माह में ही मारे गए हैं। वैसे राहुल बाबा समझदार हैं इसीलिए वह दलितों के घर जाकर तो खाना खा रहे हैं, लेकिन किसी दलित को दस जनपथ लाकर खाना नहीं खिला रहे हैं यह बात दीगर है कि दस जनपथ पर एक इफ्तार पार्टी पर ही लगभग एक करोड़ रूपया खर्च हो जाता है। क्या राहुल बाबा अपने इस दलित अभियान के तहत अगली यात्रा बिहार की करना पसंद करेंगे जहां वह दलित जाति ‘मुसहरों के टोले में रात गुजारें और उनके साथ भोजन करके यह जानने का प्रयास करेंगे कि यह लोग जिस भोजन (चूहे) को खाने की वजह से मुसहर नाम से जाने जाते हैं उसे और लोग क्यों नहीे खाते?
यह राहुल गांधी का दुर्भाग्य है कि जब वह गांव में गए तो उन्हें लोगों ने पहचाना ही नहीं और उन्हें बताना पड़ा कि वह राजीव गांधी के बेटे हैं। केवल यही एक घटना राहुल की सादगी की पोल पट्टी खोलने के लिए काफी है। क्या राजीव गांधी को कभी बताने की जरूरत पड़ी थी कि वह इंदिरा गांधी के बेटे हैं? या इंदिरा गांधी को कभी बताने की जरूरत पड़ी थी कि वह जवाहर लाल नेहरू की बेटी हैं? लेकिन राहुल गांधी को बताना पड़ रहा है कि वह राजीव गांधी के बेटे हैं।
राहुल अपने नाटक से कांग्रेस के लिए ही मुसीबतें खड़ी कर रहे हैं। अब अगर राहुल दलित इलाकों का विकास न होने के लिए कोस रहे हैं, तो किसको? इस देष पर पांच दषक तक कांग्रेस का षासन रहा। लिहाजा विकास न होने का दोश तो सबसे अधिक कांग्रेस के ही सिर पर है। फिर राहुल सवाल किससे कर रहे हैं?
रहा सवाल राहुल की सादगी का, अगर आज इंदिरा गांधी जीवित होतीं तो क्या कीतीं? मनोहर ष्याम जोषी ने इंदिरा गांधी का एक बार साक्षात्कार लिया था जब इंदिरा जी प्रधानमंत्री थीं। जोषी जी ने कांग्रेसी नेताओं की सादगी पर उनसे सवाल पूछा तो इंदिरा जी ने जबाव दिया-”यह सही है कि कांग्रेस को सादगी और जनसेवा की दिषा में नेतृत्व देना चाहिए लेकिन जो लोग यह समझते हैं कि बॅंगला छोड़कर झोपड़ी में जा बसना चाहिए नेताओं को, वह बात एक दिखावटी षगल सी मालूम होती है। कुछ सहूलियतें जरूरी होती हैं सरकारी कामकाज के लिए, सुरक्षा और गोपनीयता के भी कुछ तकाजे होते हैं। उनके पूरे किए जाने का मतलब षानो-षौकत नहीं है। हाॅं उससे अधिक कुछ होता तो वह ठीक नहीं।“ कुछ समझे राहुल बाबा! आपकी दादी स्व. इंदिरा जी आपकी सादगी को एक दिखावटी षगल बता रही हैं। इसलिए युवराज अब तो आम आदमी बनने का नाटक करके गरीबों की गरीबी का मजाक उड़ाना बन्द करो!!!
(लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं और ‘दि संडे पोस्ट’ में सह संपादक हैं।)








Sep 17, '09



लोकतंत्र की हत्या की पटकथा जगनमोहन के बहाने


अमलेन्दु उपाध्याय
आंधा्र प्रदेष के मुख्यमंत्री वाईएस राजषेखर रेड्डी की असमय मृत्यु के बाद जिस तरह से उनके पुत्र जगनमोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाए जाने की मांग उठी और इसके लिए बाकायदा लॉबिंग की गई उससे कांग्रेस का हाई कमान बहुत चिंतित है। होना भी चाहिए। चिंता कांग्रेस आला कमान को इस बात की है कि अभी तक कांग्रेस में युवराजों को राजतिलक का विषेशाधिकार सिर्फ गांधी-नेहरू खानदान को ही हासिल था। अगर जगनमोहन को आंधा्र की कुर्सी थमा दी गई तब तो राज्यों में राजतिलक की परंपरा चल निकलेगी और ऐसी स्थिति में कांग्रेस को बांधे रखने वाली ताकत गांधी परिवार का रुतबा कम हो जाएगा क्योंकि तब राज्यों के क्षत्रप भी अपने बेटों को सत्ताा सौंपने की मांग करने लगेंगे।
वीरप्पा मोइली ने अभी कहा कि सोनिया गांधी आंधा्र प्रदेष के विशय में फैसला लेंगी। याद होगा कि लोकसभा चुनाव के समय भाजपा ने आरोप जगाया था कि मनमोहन सिंह कठपुतली प्रधानमंत्री हैं और सोनिया सुपर प्रधानमंत्री। उस समय कांग्रेस ने इस आरोप को बहुत बुरा माना था। ठीक इसी तरह मध्य प्रदेष में चुनाव के समय जब भाजपा ने सवाल किया कि कांग्रेस का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार कौन है तब कांग्रेस ने कहा था कि मुख्यमंत्री चुनना विधायकों का अधिकार है और चुनाव बाद नवनिर्वाचित विधायक अपना उम्मीदवार चुनेंगे। अब सवाल यह हो सकता है कि जब मध्य प्रदेष के लिए मुख्यमंत्री चुनना विधायकों ाक विषेशाधिकार है तो आंधा्र प्रदेष के लिए सोनिया का फैसला अंतिम क्यों होगा? और अगर सोनिया ही मुख्यमंत्रियों के भाग्य का फैसला करती हैं तब तो भाजपा का आरोप सही है कि मनमोहन सिंह कठपुतली प्रधाानमंत्री हैं।
लेकिन कांग्रेस आलाकमान की चिंताओं से इतर हमारी चिंता इस प्रकरण पर और सवाल को लेकर है। हमारी चिंता यह है कि इस लॉबिंग के बीच आम कार्यकर्ता कहां खड़ा है और क्या अब कार्यकर्ता का रोल किसी राजनीतिक दल में बचा है और अगर बचा है तो वह रोल क्या है। क्या राजनीति अब कुछ परिवाारों का जन्मसिध्द अधिकार है? क्यों कार्यकर्ता आज निचले पदों पर ही काबिज हैं? हर दल और उसके शिखर नेता चुनाव के मौके पर जिस तरह से अपने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करके टिकट बांटने लगे हैं और जगनमोहन प्रकरण के तरीके से नेतृत्व निर्माण के लिए कार्यकर्ताओं को दरकिनार किया जा रहा है क्या यह लोकतंत्र के लिए षुभ समाचार है? जगनमोहन प्रकरण के बाद यह स्वाभाविक प्रश्न पैदा हो रहा है कि राजनैतिक कार्यकर्ता के लिए भारतीय लोकतंत्र में आखिर कोई जगह बची है या नहीं?
एक समय था जब पार्टियों के मूल्य और आदर्श हुआ करते थे। दल के नेता और नीतियों को देखकर लोग उससे जुड़ते थे। पार्टी भी किसी आदमी को उसके गुण, स्वभाव और चाल चलन के आधार पर पद दिया करती थी। इसलिए परिवारवाद कम हावी था। यह एक कटु सत्य है कि आज केवल उन वामपंथी दलों में परिवारवाद ने जड़े नहीं जमाई हैं जिन वामपंथी दलों के ऊपर आरोप लगते रहे हैं कि उनका सिध्दान्त तो 'सत्ताा बन्दूक की नाल से निकलती है' रहा है। पहले पार्टियां आंदोलन करती थीं और उसके बाद सदस्यता अभियान चलाती थीं। उस समय कॉलेजों से ऐसे विद्यार्थियों को जो पार्टी में आंदोलनों के अगुवा हुआ करते थे, पार्टियां अपना प्रत्याषी बनाया करती थीं। सभी दल युवा, मजदूर, किसान और विभिन्न तबकों से संबन्धित लोगों के संगठन बनाते थे। वरिष्ठ पदों पर बैठे लोगों के बच्चे दल के आदर्शों, नीतियों और मूल्यों से अगर अपरिचित होते थे तो उन्हें पार्टी में पीछे की सीट मिलती थी। मगर अब लोकतंत्र की परंपरा खत्म हो रही है। जिसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि अब पार्टियों के पास मुद्दे नहीं हैं। जनता में जो ज्यादा लोग जागरूक होते थे, पहले जो समाज के लिए कुछ करना चाहते थे, जिनके मन में जोश होता था, जिनका समाज से कुछ सरोकार होता था, और जो मुद्दों को समझना चाहते थे, वही लोग राजनीतिक कार्यकर्ता बनते थे और बाद में नेतृत्व भी संभालते थे। आज पार्टी में शामिल होने वालों का स्वार्थ होता है और पहले कार्यकर्ता को एक ख्याति की आवश्यकता होती थी। अब क्योंकि जातिवाद हावी है तो विद्यार्थी से लेकर आम नागरिक कार्यकर्ता बनने से बचने लगा है। जो नेता जिस समुदाय का होता है वह उसी समुदाय के लोगों को खोजकर कार्यकर्ता के रूप में पार्टी से जोड़ लेता है। अभी तक राजनीतिक कार्यकर्ता की जगह राजनीति में बची हुई थी क्योंकि अभी तक केवल पार्टी के ऊंचे पदों पर ही परिवारवाद हावी था। यह तमाषा है कि जिला और ब्लॉक स्तर पर तो अभी भी छोटे राजनीतिक कार्यकर्ता को ही पदासीन किया जाता है।
पहले कार्यकर्ता नेता चुनते थे। मगर अब नेता जो चाहता है वही होता है। इसलिए आम कार्यकर्ता कमजोर हुआ है। इसके अलावा जिसके पास पैसा नहीं है उसे कोई पद नहीं दिया जाता। क्योंकि पहले देहात और गांव में वहां के विकास कार्यो को हल कराने के लिए पार्टियों से जुड़ते थे मगर अब दल वहां के लिए पैसे से कार्यकर्ता खरीद लेते हैं। अब असली राजनीतिक कार्यकर्ता पसोपेश में हैं कि वह क्या करे? ईमानदारों को या तो अब चाटुकारों की तरह पार्टी के बड़े नेताओं की बात मान कर चलना होता है या फिर वह राजनीति छोड़कर घर बैठ जाता है। एक समय में गांव का कार्यकर्ता भी बड़े से बड़े नेता को साफ-साफ मुद्दों और नीतियों पर घेर लिया करते थे। मगर अब स्थिति यह है कि समाजवादी पार्टी परमाणु करार पर यू टर्न लेते हुए रात ही रात में कांग्रेस का समर्थन करने का फैसला ले लेती है और उसके बड़े से बड़े नेताओं को यह मालूम ही नहीं पड़ पाता कि ऐसा फैसला कहां ले लिया गया। यही कारण है कि जब सपा उत्तार प्रदेष में मायावती के खिलाफ आंदोलन का बिगुल बजाती है तो उसे कार्यकर्ता नहीं मिल पाते।
आदमी अपने कर्मों से राजनीतिक कार्यकर्ता बनता है। क्योंकि उसे अपने लक्ष्य के बारे में ठीक से पता होता है और उसी दिशा में वह चलना भी चाहता है। उसे हर समय एक अच्छे मंच की की तलाश भी रहती है। तो उसे राजनीति में लाने के लिए लोग आगे आ जाते हैं। ग्रामीण अंचलों में जो गांव का बच्चा समझदार होता था, पढ़ने-लिखने के बाद वह वहां की समस्याओं के लिए कदम उठाता था तो गांव के लोग उसे प्रोत्साहन देते थे। गांव के सहारे ही वह आगे बढ़ने लगता था। जब बड़ी पार्टियों के नेताओं की नजर उस पर पड़ती थी तो उसे पार्टी में शामिल हो जाने के लिए आमंत्रित करते थे। गांव के लोग भी उसे प्रेरित करते थे कि वह उनके लिए कुछ करेगा तो वह बिना किसी हिचक के उसका समर्थन करते थे। यही कारण था िकवह कांग्रेस जहां आज जगनमोहन पैदा हो रहे हैं उसी कांग्रेस में एक बैण्ड मास्टर सीताराम केसरी कांग्रेस अध्यक्ष के पद तक पहुंचा। क्या आज कल्पना की जा सकती है कि कोई सीताराम केसरी कांग्रेस में पैदा होगा?
जो लोग देश की तस्वीर बदलने के लिए घर से गुड़ खाकर मीलों पैदल चलते थे वही असली राजनीतिक कार्यकर्ता होते थे। आज भी जो वंचितों, भौतिक साधनों, अवसरों को आम जनता को देने के लिए उसके दिल में दर्द होता है वही राजनीतिक कार्यकर्ता बनता है। आज भी ग्रामीण और विद्यार्थी वर्ग ही सबसे ज्यादा राजनीति में आता है और पहले भी आया करता था। पहले भी वे विधायक बनने के लिए नहीं आते थे और न ही कोई पदाधिकारी बनने के लिए। मगर अब समय बदल गया है अब दूसरी तरह का कार्यकर्ता भी बन रहा है। यह सबसे पहले किसी पद पर इसलिए बैठना चाहता है कि वहां से कुछ अर्जित कर सके। और उसे यह सिखाया है जगनमोहन जैसों ने।
आज राजनीति का संदर्भ और उद्देश्य दोनों बदल रहे हैं। इसका लोगों के राजनीतिक निर्माण प्रक्रिया में असर पड़ रहा है। 1990 के उदारीकरण के दौर आर्थिक व सामाजिक अन्यायों के खिलाफ आवाज को उभारना था। इसलिए राजनैतिक कार्यकर्ता बनने की जरूरत होती थी। लोग सामाजिक सरोकारों के लिए समर्पित थे। यह समर्पण दक्षिणपंथी, मध्यमार्गी और वामपंथी सभीं के लिए ही बराबर लागू था। जो लोग इनके महत्व को समझते थे वे ही राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में जन्म लेते थे। पूंजीपति अपने दल की विचारधाराओं को अपनाकर ही राजनीति से जुड़ते थे। मगर 1990 के बाद से राजनैतिक मूल्यों में बदलाव आया है। आज उस तरह के राजनीतिक कार्यकर्ता बन भी नहीं रहे हैं और जो सही कार्यकर्ता हैं वह हाषिए पर धाकेल दिए गए हैं। बिल्डर, माफिया और पूंजीपति मिलकर राजनीतिक दलों का एजेन्डा तय कर रहे हैं। अगर अनिल अंबानी और मुकेष अंबानी के चहेते कांग्रेस में हें तो भाजपा में भी हैं। यही कारण है कि अगर जगनमोहन को मुख्यमंत्री बनाए जाने के लिए आंधा्र के बिल्डर्स लॉबिंग करते हैं तो समाजवादी पार्टी को फिरोजाबाद में लोकसभा चुनाव लड़ाने के लिए मुलायम के पुत्र अखिलेष की पत्नी ही उम्मीदवार मिलती हैं और सारे कार्यकर्ता दरकिनार कर दिए जाते हैं। वे अध्यापक, छात्र और पढ़े लिखे लोग जो व्यवस्था की कमियों से दुखी होते थे भ्रष्टाचार को खत्म करने के अरमान मन में पाले रहते थे वे अब हाषिए पर हैं और आने वाला समय या तो जगनमोहन, चौटाला, राबड़ी, डिम्पल यादव जैसों का होगा या फिर अनु टण्डन, निषिकांत और नाथवानी जैसे पूंजीपतियों के नुमाइन्दों का। जगनमोहन प्रकरण लोकतंत्र की हत्या की पटकथा लिखे जाने की गवाही दे रहा है।
( लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं और 'दि संडे पोस्ट' में सह संपादक हैं।)








Aug 21, '09



राह भटके योग के ब्राण्ड रामदेव
राह भटके योग के ब्राण्ड रामदेव

- अमलेन्दु उपाध्याय -
२०१४ बहुत नजदीक है, जिसके चलते योग गुरू कहलाए जाने वाले बाबा रामदेव बहुत जल्दी में हैं। चूंकि साढे चार साल का समय बचा है और देश बहुत बडा है। इसीलिए बाबा रामदेव जल्दबाजी में आदि शंकराचार्य के सिद्धान्त ”ब्रह्म सत्यम, जगत मिथ्या“ को भारत की सदियों की गुलामी का कारण बता रहे हैं, शास्त्रों में लिखी संन्यास की परिभाषा को गलत बता रहे हैं, भ्रष्टाचारियों की जमात में लालू प्रसाद यादव का नाम लेने पर कुपित हो रहे हैं, उन्हें अपने असली नाम ’रामकृष्ण यादव‘ के नाम से पुकारे जाने पर भी आपत्ति है और वह अभिनेत्रियों को वेश्या बता रहे हैं।

बबा रामदेव पिछली दस अगस्त को नौएडा में थे। साप्ताहिक समाचार पत्र ’दि संडे पोस्ट‘ के कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम ’टॉक ऑन टेबल‘ में उन्होंने शिरकत की और अपने एजेन्डे पर खुलकर बोले। रौ में बोलते हुए बाबा कह गए कि ”शास्त्रों में संन्यास की परिभाषा ही गलत लिखी है।’ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या‘ वैसा संन्यास नहीं है।“ बाबा इतने पर ही नहीं रूके। जब ’नई दुनिया‘ के राजनीतिक संपादक विनोद अग्निहोत्री ने उनसे पूछना चाहा कि ” यह जो ’ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या‘ का सिद्धान्त दिया गया…“ तो उनका प्रश्न पूरा सुने बिना बात बीच में ही काट कर बाबा बोले- ”इसी ने देश का बहुत नुकसान किया है। आज भारत का जो आघ्यात्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक क्षरण हुआ है, वह इसी से हुआ है। सात्विक लोगों ने ’ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या‘ कहकर जैविक संसाधनों का संचय नहीं किया। अधर्म, असत्य, अन्याय, शोषण, अपराध, दुराचार, व्यभिचार का विरोध नहीं किया। हम ठीक हैं तो , बाकी चीजों से हमें क्या लेना देना। इस दर्शन ने भारत को सदियों की गुलामी की तरफ ढकेल दिया।“

जब अगले दिन एक समाचार पत्र में यह खबर छपी कि बाबा रामदेव ने आदि शंकराचार्य के सिद्धान्त को चुनौती दी, तो बखेडा खडा होने पर बाबा ने कह दिया कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा। लेकिन ’दि संडे पोस्ट‘ ने पूरी बात अक्षरशः प्रकाशित कर दी। अब बाबा के पास कहने को क्या है?

अब बाबा से प्रश्न पूछा जा सकता है कि अगर ’ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या‘ सिद्धान्त गलत है और शास्त्रों में लिखी हुई संन्यास की परिभाषा गलत है तब बाबा रामदेव संन्यासियों की वर्दी भगवा कपडे पहने क्यों घूम रहे हैं? क्या बाबा को जो मान सम्मान, धन देश भर से मिल रहा है वह एक संन्यासी होने के कारण नहीं मिल रहा है? और अगर बाबा संन्यास के लिए घर-बार छोडना जरूरी नहीं मानते हैं तो उन्हें उनके असली नाम ’रामकृष्ण यादव‘ पुकारे जाने पर आपत्ति क्यों है और क्यों उन्होंने अपना घर-बार छोडकर संन्यासियों की परंपरा के अनुसार बाबा शंकरदेव से दीक्षा क्यों ली?

बाबा रामदेव योग के जरिए तनाव, ब्लड प्रेशर, डाइबिटीज, कैंसर, सबकी दवा बट रहे हैं लेकिन वह नुस्खा नहीं बता रहे हैं जिस नुस्खे से बाबा पिछले दस वर्षों में २७०० करोड रूपए के आदमी बन गए? बाबा इस सबके बीच भ्रष्टाचारियों के खिलाफ आंदोलन करने की बात करते हैं लेकिन लालू प्रसाद यादव उनके परम शिष्यों में से एक हैं और बाबा इस बात पर बिफर पडते हैं जब टॉक ऑन टेबल में कोई उनसे लालू के विषय में पूछ लेता है। याद है न कि बाबा ने चुनाव के दौरान भाजपा के विदेशों में जमा धन वापिस लाने के नारे में ताल से ताल मिलाई थी। लेकिन आश्चर्य है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लडने का दावा करने वाले बाबा की दिव्य फार्मेसी के मजदूर न्यूनतम मजदूरी दिलाए जाने की माँग करते हैं। हां बाबा को इस बात का श्रेय दिया जा सकता है कि जिस तेजी से कई बडी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अपने प्रोडक्ट्स को लोकप्रिय नहीं बना पाईं बाबा ने बहुत कम समय में योग की जबर्दस्त मार्केटिंग की और पिछले एक दशक में योग जबर्दस्त प्रोडक्अ बन कर उभरा है। बाबा संन्यासी भी हैं, योगी भी हैं, आयुर्वेद के डॉक्टर भी हैं और जिसे कबीर ने ’माया महाठगिनी‘ कहा था उस माया के बडे साधक भी हैं और उनका संघर्ष भी भ्रष्टाचार के खिलाफ है। है न हैरानी वाली बात! फिर भी बाबा का योग धर्मशास्त्रों में बताया गया योग नहीं है। बाबा स्वयं कहते हैं कि ”योग को धर्म सम्प्रदायों, पूजा पद्धतियों से जोडने का कोई मतलब नहीं है।….ओम कोई मजहबी शब्द नहीं है।“ बाबा सदियों से तपस्या करते आ रहे भारतीय मनीषियों की तपस्या पर एक झटके में पानी फेर देते हैं

इसी काय्रक्रम में बाबा रामदेव ने सारे पढे लिखे लोगों को अपसंस्कृति वाला घोषित कर दिया। बाबा ने कहा कि- ” आप सुबह से शाम तक जो भी देखते हो उसको अपसंस्कृति के तौर पर नहीं ले रहे हो। उसे सभ्यता के तौर पर ले रहे हो। वे तो पढे लिखे लोग हैं, वे तो ऐसा करेंगे। इसे ही करने के लिए तो वे पैदा हुए हैं। १७६० में इस नशा का व्यापार अंग्रेजों ने शुरू किया था। उससे पहले भारत बहुत अच्छा था। १७६० में इसको वैधानिकता दी गई नशा और वासना को। अंतर क्या है पैसे के लिए एक कोठे में बैठकर अपने शरीर को बेचती है। एक सेट और पर्दे पर बैठकर शील और शरीर को। अंतर क्या है? नाम का ही तो अंतर है। एक को वेश्या कहते हैं दूसरी को अभिनेत्री। अंतर क्या है? खाली नाम का अंतर है।“

हैं न बाबा महान जो सारे पढे लिखे लोगों को बता रहे हैं कि वे तो पैदा ही अपसंस्कृति फैलाने के लिए हुए हैं और अभिनेत्रियां वेश्या हैं। बाबा का अभिनेत्रियों को वेश्या कहना नारी जाति का अपमान है। बाबा मद में अन्धे होकर अपना विवेक खो बैठे हैं और भूल जा रहे हैं कि वह क्या क्या बक रहे हैं। अगर अभिनेत्रियां वेश्या हैं तो पैसे के लिए अध्यात्म, धर्म, योग और लोगों की भावनाओं को बेचने वाला क्या है? आप तय करें।


(लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं और ’दि संडे पोस्ट‘ में सह-संपादक हैं।)







Aug 19, '09



व्यापारिक घरानों के हितसाधक सांसद
अमलेन्दु उपाध्याय -

सांसद का मानसून सत्र समाप्त हो गया। अमूमन जैसा संसद का सत्र हंगामेदार रहता है, यह सत्र भी हंगामेदार रहा। लेकिन इस बार हंगामे का कारण दूसरा ही था। अब तक हंगामे का कारण सरकार की कुछ मुद्दों पर नाकामियां हुआ करती थीं और कहीं न कहीं इसमें आम आदमी की चिंताएं संसद में उठती थीं, भले ही इसमें राजनीतिक दलों की राजनीतिक चालें ज्यादा रहती हों और आम आदमी की चिंताएं कम, लेकिन कम से कम आम आदमी की चिंताएं संसद में उठती तो थीं और सरकार को इन पर विचार भी करना पडता था। परंतु इस बार संसद सत्र से आम आदमी के मुद्दे गायब थे और बहुत निर्लज्जता के साथ हमारे माननीय सांसद दो पूंजीपतियों के खेमे में बंटकर संसद का बहुमूल्य समय बरबाद कर रहे थे।

सांसद के कारपोरेटीकरण की शुरूआत की ’अनिल अंबानीवादी समाजवाद‘ के ठेकेदार तथाकथित समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव ने। यूं तो मुलायम सिंह खुद को गरीबों का रहनुमा कहते नहीं थकते हैं और स्वयं को डाँ लोहिया के नाम पर चलने वाली दुकानदारी का एकमात्र वारिस भी मानते हैं, लेकिन संसद में नेता जी अनिल अंबानी के हितों के लिए उलझे हुए थे। हालांकि नेता जी यह जताने से परहेज भी कर रहे थे कि वह अनिल अंबानी के पेड वर्कर हैं, इसलिए बार बार देश हित का हवाला दे रहे थे। अब नेता जी कितने महान हैं कि अगर अनिल अंबानी को गैस दो रूपए के बदले अडतीस रूपए के भाव मिलेगी तो देश का बहुत अहित हो जाएगा।

अमूमन लोगों की धारणा यह थी कि मुलायम सिंह के दाहिने हाथ अमर सिंह ही अनिल अंबानी के लिए काम करते हैं, लेकिन पहली बार मुलायम सिंह ने स्वयं आगे बढकर इस भ्रम को तोडा और साबित किया कि केवल अमर सिंह ही नहीं बल्कि वह स्वयं भी अब अनिल अंबानी के लिए काम करते ह। मुलायम सिंह के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी के सांसदों ने पूरे एक दिन लोकसभा में जमकर हंगामा मचाया और पैट्रोलियम मंत्री मुरली देवडा के इस्तीफे की मांग भी कर डाली। तमाशा देखिए कि इन सपा सांसदों ने देवडा के इस्तीफे की मांग तब नहीं की जब देवडा ने डीजल और पैट्रोल के दाम संसद का सत्र प्रारम्भ होने से पहले ही बढाकर आम आदमी की कमर तोड दी थी और देवडा के इस फैसले से सबसे ज्यादा नुकसान सूखे की मार झेल रहे उत्तर प्रदेश के उस किसान को हुआ है जिसकी राजनीति करने का दावा अभी तक मुलायम सिंह करते रहे हैं।

गौरतलब बात यह है कि जिस समय समाजवादी पार्टी के सांसदों ने यह हंगामा किया उस समय महंगाई पर चर्चा होनी थी, लेकिन अनिल अंबानी की नौकरी करने के चक्कर में सपा सांसदों ने महंगाई पर चर्चा ही नहीं होनी दी। अब मुलायम सिंह कह रहे हैं कि वह अपने समाजवादी साथियों से सरकार की नाकामियों पर फोकस करने के लिए कह रहे हैं।

केवल समाजवादी पार्टी ही नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी भी अनिल अंबानी की पैरोकारी में जुटी हुई थी। अब बताया जाता है कि अनिल अंबानी और मुकेश अंबानी के झगडे में अगर मुकेश अंबानी का नुकसान होगा तो एस्सार ग्रुप का फायदा होगा। लोकसभा में भाजपा की उपनेता सुषमा स्वराज के पति स्वराज कौशल एस्सार ग्रुप के मुलाजिम बताए जाते हैं इसलिए एस्सार को अप्रत्यक्ष फायदा दिलाने के लिए भाजपा सांसद भी सपा सांसदों के साथ थे। भाजपा सांसदों को लामबंद करने का काम भाजपा सांसद निशिकांत कर रहे थे। चर्चा है कि निशिकांत को टिकट दिलाने में स्वराज कौशल का योगदान रहा है। इसलिए निशिकांत यह कर्ज उतारने के लिए राष्ट्रभक्ति की दुहाई देकर मुकेश अंबानी के खिलाफ जुटे हुए थे। उधर पैट्रोलियम मंत्री मुरली देवडा मुकेश अंबानी के पुराने वफादार बताए जाते हैं, तब से जब वह मुम्बई कांग्रेस के अध्यक्ष होते थे और कांग्रेस के लिए फंड जुटाते थे। इसलिए कांग्रेस के लोग राष्ट्रभक्ति के नाम पर मुकेश अंबानी के पक्ष में खडे थे।

मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी के बीच झगडा कृष्णा गोदावरी बेसिन में मिली गैस के बंटवारे का लेकर है। जब रिलायंस ने गैस खोजने का ठेका लिया था उस समय उसका बंटवारा नहीं हुआ था। बाद में बंटवारे में गैस मुकेश के हिस्से में आ गई और अनिल अंबानी के हिस्से में ऊर्जा। अब मुकेश गैस का दाम अपने हिसाब से तय कर रहे हैं जिससे अनिल को उस स्तर पर फायदा नहीं हो पाएगा जितना सस्ती गैस मिलने पर होता। इस बीच सरकार ने सर्वोच्च अदालत में यह कहकर कि गैस राष्ट्रीय संपदा है, उसका मूल्य दो भाई मिलकर तय नहीं कर सकते, प्रत्यक्ष तौर पर तो राष्ट्रहित की बात की लेकिन इसके पीछे मंशा राष्ट्रहित की नहीं थी। लेकिन सरकार के इस स्टैण्ड पर वामपंथी दलों ने सरकार को फांस लिया और उससे मांग की कि वह अपने रुख पर कायम रहे।

लेकिन हद तो तब हो गई जब झारखण्ड से निर्दलीय सांसद परिमल नाथवानी ने राज्यसभा में स्वीकार किया कि हां वह ’रिलायंस से जुडे हुए हैं‘। इसलिए नाथवानी ने जमकर मुकेश अंबानी के पक्ष में संसद में तर्क दिए और अपनी नौकरी को राष्ट्रभक्ति का मुलम्मा चढाया। नाथवानी ने तर्क दिया कि अगर मुकेश अंबानी गैस का दाम तय नहीं करेंगे तो अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारत की नाक कट जाएगी। अब नाथवानी के लिए मुकेश की नौकरी राष्ट्रभक्ति है और मुलायम सिंह और निशिकांत के लिए अनिल की नौकरी।

माकपा सांसदा वृंदा कारत ने इस बहस के बीच राज्यसभा के सभापति को पत्र लिखकर सही बात कही कि जिस सांसद की आस्थाएं किसी कंपनी से सीधे जुडी हैं वह सदस्य संबंधित डिबेट में भाग न लेने पाए। सदन को किसी व्यापारिक घराने के लिए प्रयोग नहीं किया जा सकता है चूंकि कई सांसद औद्योगिक घरान के नौकर और सहयोगी हैं और ऐसे सांसदों के आचरण से सदन की गरिमा को ठेस पहुंचती है। लेकिन बासठ वर्षीय आजाद हिन्दुस्तान का यह दुर्भाग्य है कि आज नाथवानी निशिकांत और मुलायम सिंह जैसे लोग भारतीय संसद को शर्मसार कर रहे हैं।
( लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं और ’दि संडे पोस्ट‘ में सह संपादक हैं।)









Aug 03, '09








































jan nahin janpratinidhi kee suraksha par hangama


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Jul 25, '09




बहन जी को गुस्सा क्यों आता है?
अमलेन्दु उपाध्याय

उत्तर प्रदेश में ‘बलात्कार राजनीति’ एक नए मोड़ पर आ गई है। मुख्यमंत्री मायावती के खिलाफ कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी की विवादित टिप्पणी के बाद प्रदेश में जो हुआ उसका समर्थन कोई बड़े से बड़ा दलित समर्थक भी नहीं कर सकता। सबसे बड़ा तमाशा यह है कि न तो रीता जोशी दलित हैं और न रीता जोशी का घर फूंकने वाले बसपा विधायक जितेन्द्र सिंह बबलू और इंतिजार आब्दी दलित हैं। ऐसा भी नहीं है कि मायावती के रीता जोशी के खिलाफ सख्त कदम उठा लेने से दलितों की अस्मिता की रक्षा हो गई है। न रीता के बयान के बाद प्रदेश में दलित महिलाओं के साथ बलात्कार रुक जाएंगे। लिहाजा बलात्कार जारी रहने पर मायावती भी पीड़ित महिलाओं की नुमाइश कराकर उन्हें पच्चीस हजार रुपये देकर अपने वोट पक्के करने का काम जारी रखेंगी। कायदे की बात तो यह है कि दलितों के साथ बलात्कार जारी रहने में ही कांग्रेस और बसपा दोनों का फायदा है। इसलिए यह बलात्कार भी जारी रहेंगे और इन बलात्कार पर राजनीति भी।
अगर देखा जाए तो रीता जोशी का बयान बेहद भद्दा कहा जा सकता है, लेकिन सिर्फ उनके बयान की निन्दा करके और उनका घर फुंकवाकर मायावती क्या अपनी करतूतों का बचाव कर पाएंगी? विगत दो वर्ष में प्रदेश रसातल में पहुंच चुका है। सारे माफिया, बड़े अपराधी और चोर उचक्के बहन जी के कारवां की शोभा बढ़ा रहे हैं। बहन जी भी पूरी तल्लीनता से अपनी और अपने आराध्य कांशीराम की पत्थर की मूर्तियां लगवाने में ही प्रदेश का सारा धन और मशीनरी फूंक रही हैं। क्या तमाशा है कि जब एक दलित महिला से बलात्कार हो जाता है तब प्रदेश का पुलिस महानिदेशक हैलीकॉप्टर से पीड़ित के घर जाता है और लोगों को इकठ्ठा करके धमकी देता है कि किसी ने भी इस घर की तरफ ऑंख उठाकर देखा तो खैर नहीं। अब उस बहादुर पुलिस महानिदेशक, जिसकी बहादुर फौज को एक अकेला डकैत सिर्फ एक राइफल से 52 घंटों तक टक्कर देता है और चार जवानों की बलि ले लेता है, से सवाल पूछा जाए कि महोदय आपके बहादुरी भरे वक्तव्य का क्या मतलब है और क्या पच्चीस हजार रुपये से किसी दलित की इज्जत वापिस लौट आएगी? जाहिर है कि इस वक्तव्य से सिर्फ मायावती का वोट पक्का होगा और कुछ नहीं और इसके लिए मायावती पूरा प्रयास भी कर रही हैं।
पिछले दो वर्षों में मायावती ने प्रदेश में एक नई किस्म की संस्कृति विकसित की है। अपराधी किस्म के अधिकारी उनकी खास टीम का नेतृत्व कर रहे हैं। यह टीम सिर्फ मायावती के राजनीतिक विरोधियों को प्रताड़ित करने और अवैध धन वसूली करने का एकसूत्रीय काम कर रही है। मायावती अपने इन अपराधों को छिपाने के लिए ही दलित होने का नाटक करती हैं। रीता जोशी के प्रकरण में भी मायावती की अफसरों की इस फौज ने बहुत बहादुरी दिखाई है। चर्चा है कि जिस समय बसपा के गुण्डे रीता बहुगुणा का घर फूंक रहे थे उस समय लखनऊ के विवादास्पद आईजी सादा वर्दी में बाकायदा मौके पर गश्‍त कर रहे थे कि काम को सही तरीके से अंजाम दिया जा रहा है कि नहीं। इतना ही नहीं घर फूंकने से पहले पुलिस रीता के घर पर मौजूद सारे कर्मचारियों गिरफ्तार कर ले गई। अगर यह हिंसा राज्य प्रायोजित नहीं थी तो मुख्यमंत्री कार्यालय से बमुश्किल सौ मीटर दूर स्थित रीता के घर पर फायर ब्रिगेड तब क्यों पहुंचा जब सब कुछ जलकर राख हो चुका था। यह घटना साबित करती है कि उत्तार प्रदेश में पूर्णत: राज्य प्रायोजित गुण्डाराज है और उत्तार प्रदेश धारा 356 लगाने का सही केस है।
मायावती ने एक बार भी रीता के घर पर हुई घटना के लिए न तो माफी माँगी और न यह स्वीकार किया कि इस कांड के पीछे उनके लोग थे बल्कि लगातार वह कुतर्क कर रही हैं। जैसे उन्होंने कहा कि रीता ने अपनी एक किताब में गांधी परिवार के लिए अपषब्दों का प्रयोग किया था। अब बहन जी की याद्दाश्‍त कितनी कमजोर है। बहन जी भूल गईं कि अरूण शंकर शुक्ल अन्ना नाम के आदमी पर आज भी लखनऊ स्टेट गेस्ट हाउस कांड का मुकदमा चल रहा है और वह अन्ना, आज मायावती के नवरत्नों में हैं। ‘लखनऊ स्टेट गेस्ट हाउस कांड’ वही घटना है जब मायावती पर मुलायम सिंह यादव की सरकार से समर्थन वापिस लेने पर हमला किया गया था। इसी तरह दीनानाथ भास्कर नाम के एक व्यक्ति ने नब्बे के दषक में मायावती पर भयानक किस्म के व्यक्तिगत आरोप लगाए थे, जो रीता जोषी की भाशा से ज्यादा भद्दे थे। लेकिन भास्कर आजकल मायावती की नाक के बाल हैं। ऐसे ही धनन्जय सिंह मायावती की कृपा से आज माननीय सांसद हैं। यह वही धनन्जय सिंह हैं, जिन्हें मायावती ने रघुराज प्रताप सिंह ‘राजा भैया’ के साथ जेल भिजवा दिया था क्योंकि धनन्जय उस समय मायावती की सरकार गिराना चाहते थे। धनीराम वर्मा का भी मामला कुछ ऐसा ही दिलचस्प है। धनीराम वर्मा 1995 में उत्तार प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष थे। जब मायावती ने मुलायम सरकार से समर्थन वापिस लिया तो धनीराम वर्मा ने मुलायम सिंह की सरकार को विधानसभा में जबर्दस्ती बहुमत साबित करा दिया। लेकिन आज धनीराम वर्मा मायावती के चहेते हैं। मायावती यह जानती ही नहीं हैं कि उनकी सात पुश्‍तें भी मिलकर कभी हेमवती नन्दन बहुगणा के बराबर नहीं हो पाएंगी।
प्रदेश में इस गाली गलौच वाली राजनीति की शुरूआत भी मायावती ने ही की है, फिर मायावती को दर्द क्यों होता है? क्या कभी किसी व्यक्ति ने मायावती के मुँह से मुलायम सिंह यादव के लिए सम्मानजनक सम्बोधन सुना है? क्या मायावती ने मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री रहते ठीक यही भाषा इलाहाबाद में एक कांड के बाद इस्तेमाल नहीं की थी? एक टीवी टॉक में ही मायावती ने मुलायम सिंह के लिए गुण्डा शब्द का प्रयोग किया था जिस पर तत्कालीन सपा के प्रदेश अध्यक्ष रामशरणदास से मायावती की गाली गलौच हो गई थी। इसी तरह सिपाहियों की बर्खास्तगी के बाद जब मायावती के चहेते पुलिस अफसर शैलजाकांत मिश्र ने भर्ती में यौन शोषण के आरोप लगाए थे तब मायावती ने मिश्र के कान क्यों नहीं अमेठे? जबाव में शिवपाल ने भी ऐसी ही शब्दावली प्रयोग की जैसी रीता ने की। लेकिन तब मायावती के बहादुर गुण्डे शिवपाल का घर फूंकने का दुस्साहस नहीं कर सके।
कुल मिलाकर कांग्रेसी भी कमाल के लोग हैं। जब उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की सरकार थी तो रोज दस जनपथ की दौड़ लगाते थे और चिल्लाते थे कि प्रदेश में जंगलराज है, सरकार को बर्खास्त करो। लेकिन अब जब सरकार बर्खास्तगी का सही केस आया है तो यह कांग्रेसी धुरंधर आपस में ही सिर फुटव्वल कर रहे हैं और इसी गम में आपस में लड़े जा रहे हैं कि इससे रीता बहुगुणा को फायदा हो गया।
अब लाख टके का सवाल यह है कि इस समूचे घटनाक्रम से किसे क्या फायदा हुआ और क्या नुकसान हुआ? इस घटना से सर्वाधिक नुकसान मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी का हुआ। अभी तक मायावती विरोध का लाभ मुलायम सिंह ही उठाते रहे हैं, लेकिन मायावती के एक नादान कदम ने कांग्रेस को अप्रत्याशित लाभ दिला दिया और रीता बहुगुणा रात ही रात में मायावती विरोधी मुहिम की हीरो बन गईं। अब अगर नाकारा कांग्रेसी, पार्टी के अन्दर रीता की घेराबंदी न करें, तो मायावती के खिलाफ प्रदेष की जनता में जो गुस्सा है उसे कांग्रेस भुना सकती है। लेकिन कांग्रेस से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह मायावती के खिलाफ आगे बढ़कर सरकार बर्खास्त करने जैसा कोई कदम उठा पाएगी। क्योंकि कांग्रेस एक भयंकर दुविधा का शिकार है कि उसे उत्तर प्रदेश में दलित वोट भी चाहिए। जो किसी भी सूरते हाल में संभव नहीं है। अगर कांग्रेस इस दुविधा में रहेगी कि उसे दलित वोट भी मिल जाएंगे तो वह अपना नुकसान कर बैठेगी। प्रदेश में दलितों का एक बड़ा वर्ग मायावती की लाख कमियों के बावजूद बसपा से ही जुड़ा रहेगा फिर चाहे राहुल गांधी सिर पर पला रखकर मैला ढोने का ही नाटक क्यों न कर लें। इसलिए कांग्रेस अगर उत्तार प्रदेष में वापसी करना चाहती है तो उसे मायावती विरोध की लाइन को और क्लियर करना पड़ेगा।
[लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं और 'दि संडे पोस्ट' में सह संपादक हैं। संपर्क: एस सी टी लिमिटेड सी-15, मेरठ रोड इण्डस्ट्रियल एरिया गाजियाबाद मो 9313517853
amalendu.upadhyay@gmail.कॉम]









Jul 10, '09




गजनी के भारतीय अवतारों को सजा मिले 
अमलेन्दु उपाध्याय
-  वरना महमूद गजनवी के संघी अवतार तो बाबरी मस्जिद को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी समझकर पाल रहे थे लेकिन उनके पाले बंदरों ने ऐन मौके पर काम खराब कर दिया। अब अगर इन नागपुरियों ने बाबरी मस्जिद नहीं गिराई थी तो यह इसका श्रेय क्यों लेना चाहते हैं और जब श्रेय लेना चाहते हैं तो लिब्राहन की रिपोर्ट से घबरा क्यो रहे हैं।
-आखिरकार लिब्राहन आयोग की बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट आ ही गई। इस हाई प्रोफाइल केस की जांच रिपोर्ट आने में ही कुल जमा सत्रह वर्ष लग गए। जाहिर है कि ऐसी गति से तो मुकदमें मे सजा सुनाए जाने में सत्रह सौ साल लगेंगे, वह भी तब, जब मुकदमा कायम होगा। इस सबके परे बहस का विषय यह है कि क्या इस आधार पर दोषियों को माफ कर दिया जाए कि सजा होने में कई साल लग जाएंगे? बहरहाल इस रिपोर्ट पर राजनीति शुरू हो गई है और हर कोई अपने हिसाब से कार्रवाई चाहता है।
लिब्राहन आयोग ने भाजपा समेत कई बडे दलों को पशोपेश में डाल दिया है और अनुमान लगाया जा रहा है कि जो रिपोर्ट जस्टिस लिब्राहन ने दी है उसका हश्र भी पहले बन चुके अन्य आयोगों की तरह होगा, जिनमें से कई की रिपोर्ट बस्ते में से निकलने के लिए तडपडा रही हैं और कई की रिपोर्ट पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुईर्। कहा जा रहा है कि इस रिपोर्ट ने मरती हुई भाजपा के लिए संजीवनी का काम किया है और भाजपा चाहती है कि सरकार इस रिपोर्ट पर कार्रवाई करे ताकि वह एक बार फिर इंसानों की लाशों की राजनीति करके दिल्ली की सल्तनत पर पहुंचने का सपना साकार कर सके। लेकिन अब भाजपा के यह सपने साकार नहीं होंगे। और अगर मान भी लिया जाए कि इससे भाजपा को पांच साल बाद होने वाले चुनाव में कोई फायदा होगा, तो क्या इस अंदेशे के कारण बाबरी मस्ज्दि के क.ातिलों को खुला छोड दिया जाए? हालांकि यह कल्पित भय है और ऐसा भी नहीं है कि हमेशा ऐसी घटनाओं में सांप्रदायिक ताकतों को फायदा ही होता हो। बाल ठाकरे का मतदान का अधिकार छीना गया इससे शिवसेना को लाभ नहीं हुआ बल्कि वह पिछड गई। इसी तरह इस लोकसभा चुनाव के दौरान आडवाणी जी आतंकवाद पर बहुत चिल्लाए, मुंबई में २६/११ हुआ लेकिन जब इसके बाद चुनाव हुए तो भाजपा बुरी तरह पिछड गई।
फिर अभी लोकसभा चुनाव में पांच साल हैं, अगर सरकार रिपोर्ट पर कार्रवाई करने के प्रति वास्तव में ईमानदार है तो फास्ट ट्रैक कोर्ट कर गठन करके हर रोज सुनवाई कराकर दो महीने में फैसला भी करवा सकती है। ऐसे में भाजपा क्या फायदा उठा पाएगी? चूंकि जब पांच साल बाद इसका लाभ उठाने का अवसर आएगा तब तक आडवाणी जी सियासत से विदा हो चुके होंगे। कल्याण सिंह और उमा भारती भाजपा से बाहर हैं हीं। बाकी जिन लोगों को इस केस में सजा हो सकती है वह लोग राष्ट्रीय अपील नहीं हैं। इसलिए भाजपा कोई फायदा नहीं उठा पाएगी।
दरअसल कांग्रेस की दिक्कत यह है कि संभवतः इस रिपोर्ट में पी वी नरसिंहाराव और कांग्रेस की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। ऐसे में क्यों कांग्रेस ईमानदारी से इस रिपोर्ट पर कार्रवाई करेगी? ताज्जुब इस बात का है कि मुलायम सिंह के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी जो लगातार बाबरी मस्जिद की कमाई खाती रही है, इस रिपोर्ट पर चुप लगा गई है। इसका कारण है। सपा के नए दोस्त कल्याण सिंह भी इस कांड में दोषी हैं जबकि मुलायम सिंह यादव चुनाव के दौरान कल्याण के गुनाहों को माफ करके घोषणा कर चुके हैं कि बाबरी मस्जिद अब मुद्दा नहीं रहा, जिसका उन्हें इस चुनाव में खमियाजा भी भुगतना पडा। अब अगर मुलायम सिंह कुछ बोलते हैं तो उनके दोस्त कल्याण सिंह के लिए मुश्किलें पैदा हो जाएंगी।
इस मसले में जल्द से जल्द दोषियों को सजा मिलनी चाहिए। ऐसा इसलिए नहीं कि कुछ लाख गुंडों ने एक मस्जिद तोड दी थी। ऐसे तो हर रोज कहीं न कह मस्जिद और मंदिर तोडे ही जाते हैं। नरेन्द्र मोदी ने अभी गुजरात में कई मन्दिर गिरवाए। पाकिस्तान में कई मस्जिदें गिराई गईं। कश्मीर के राजा हर्ष ने तो बाकायदा मंदिर तोडने के लिए ’देवोत्पतन्नायक‘ नाम के अधिकारी की नियुक्ति की थी। इस केस में दोषियों को सजा मिलना इसलिए जरूरी है क्योंकि बाबरी मस्ज्दि शहीद करने वाले गुंडों ने इस मस्जिद के बहाने इस देश के धर्मनिरपेक्ष संविधान पर हमला किया था, इंसानियत को तार तार किया था। स्वयं तत्कालीन राष्ट्रपति को यह कहने के लिए मजबूर होना पडा था कि बाबरी मस्जिद को गिराने वाले गुंडे थे।
हालांकि कल्याण सिंह का लिब्राहन आयोग में गवाही में कहना कि ऐसा करने को कोई पूर्वनियोजित कार्यक्रम नहीं था, सत्य ही है। दरअसल भाजपा बाबरी मस्जिद गिराना नहीं चाहती थी वह केवल इसे मुद्दा बनाकर रखना चाहती थी ताकि इस पर सियासत करती रहे और इसके जरिये धन इकठ्ठा होता रहे। लेकिन भाजपा ने जिन बंदरों की फौज अयोध्या में ६ दिसंबर १९९२ को अयोध्या में जमा की उस पर उसका नियंत्रण नहीं रहा। वरना महमूद गजनवी के संघी अवतार तो बाबरी मस्जिद को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी समझकर पाल रहे थे लेकिन उनके पाले बंदरों ने ऐन मौके पर काम खराब कर दिया। अब अगर इन नागपुरियों ने बाबरी मस्जिद नहीं गिराई थी तो यह इसका श्रेय क्यों लेना चाहते हैं और जब श्रेय लेना चाहते हैं तो लिब्राहन की रिपोर्ट से घबरा क्यो रहे हैं।
- लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं एवं साप्ताहिक पत्र "दी सन्डे पोस्ट " में सह सम्पादक हैं।







Jun 17, '09



सच न घटता है न बढ़ता है, बृजेश जी
Wednesday, 17 June 2009 02:20 अमलेन्दु उपाध्याय 
अमलेंदु उपाध्याय
बी4एम पर प्रकाशित वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोषी के एक अभियान, जिसमें उन्होंने चुनाव के दौरान कुछ समाचारपत्रों द्वारा धन लेकर खबरें छापने पर ऐतराज जताया है, पर कई नामी गिरामी पत्रकार अपनी भड़ास निकाल चुके हैं। यहां मैं अपनी बात प्रारंभ करने से पहले स्पष्ट कर दूं कि मैं ना तो प्रभाष जी का प्रवक्ता हूं और न कभी उनसे मिला हूं। रही बात आलोक तोमर और बृजेश कुमार सिंह की तो आलोक तोमर को भी बरसों से पढ़ता रहा हूं पर मिला कभी नहीं हूं। और यह बृजेश कुमार सिंह कौन हैं और कहां पाए जाते हैं, मैं नहीं जानता। अब यह मेरा अज्ञान हो सकता है या दुर्भाग्य कि मैंने इस देश की सवा अरब आबादी के नाम की तरह बृजेश जी का नाम इससे पहले कभी नहीं सुना। इसलिए मैं न तो आलोक तोमर के खेमे में हूं और न बृजेश सिंह के। दूसरी बात यह कि मैंने कभी जनसत्ता में नौकरी भी नहीं की है और वहां नौकरी मांगने जा भी नहीं रहा हूं। हां, बी4एम से ही मालूम पड़ा कि बृजेश जी एक लाला के पैम्फलेट में (क्षमा करें उसे 'अखबार' की संज्ञा देकर अखबार शब्द का अपमान नहीं किया जा सकता!) मुलाजिम हैं और चूंकि लाला की उस दुकान का आरएनआई में रजिस्ट्रेशन है इसलिए बृजेश जी तकनीकी रूप से पत्रकार कहलाए जाने के अधिकारी हैं। इसलिए मैं सिर्फ मुद्दे की बात करना चाहता हूं और हो सकता है उससे बृजेश जी मुझसे कुपित हो जाएं।

प्रभाष जी ने अखबारों के जिस कारनामे पर ध्यान खींचा है, अखबारों के वह कुकृत्य बृजेश जी जैसे लोगों के लिए, जो पत्रकारिता को सिर्फ लाला की नौकरी समझते हैं, सम्मान की बात हो सकते हैं। लेकिन जो लोग पत्रकारिता को मिशन बनाकर या आम आदमी की आवाज समझकर काम करते हैं उनके लिए अपमान की बात हैं। बृजेश जी ने प्रभाष जी से कुछ सवाल किए हैं और उनके उत्तार न मिलने पर दुख प्रकट किया है। बेहतर होता कि बृजेश जी ने यह सवाल एक पत्रकार की हैसियत से पूछे होते, लेकिन उन्होंने जिस अंदाज में अपनी बात कही है उससे तो लगता है कि उन्होंने यह सवाल अपने लाला की नजरों में अपने नंबर बढ़ाने के लिए किए हैं। बहरहाल बृजेश जी अगर प्रभाष जी से सवाल करने से पहले एक मुकम्मल पत्रकार बन पाए होते तो खुशी हुई होती। वह तो अपने लाला के माउथपीस बनकर रह गए। बता दिया जाए कि 'जागरण' पर सवाल प्रभाष जी ने तो बहुत बाद में उठाए हैं सबसे पहले तो जागरण के खिलाफ मोर्चा तो उन अटल बिहारी वाजपेयी, जिन्होंने नरेंद्र मोहन को राज्यसभा का सदस्य बनाया था, की खड़ाऊ लेकर चुनाव लड़ रहे लालजी टंडन ने खोला था। साथ में उन मोहन सिंह ने, जिनकी पार्टी ने महेंद्र मोहन को राज्यसभा का सदस्य बनाया था, खुला सवाल किया था कि महेंद्र मोहन बताएं कि राज्यसभा सदस्य बनने के लिए उन्होंने सपा को कितने रूपए दिए थे।

जहां तक जागरण का सवाल है तो उसने पत्रकारिता का अपमान पहली बार नहीं किया हैं इससे पहले भी बाबरी मस्जिद की शहादत के वक्त भी उसने पत्रकारिता को कलंकित किया था और उसके कृत्य पर उसे प्रेस कौंसिल से लताड़ भी पड़ी थी। बृजेश जी ने जनसत्ता के बाबत भी कुछ कमेंट किए हैं। अब बृजेश जी चूंकि एक बड़े लाला के नौकर हैं इसलिए बड़े पत्रकार भी हैं। लेकिन बृजेश जी ही स्वयं बता दें कि क्या जागरण अपने कर्मचारियों का भयंकर शोषण नहीं करता है? रही बात बिकने की तो 'हंस' कम बिकती है और 'मायापुरी' व 'मनोहर कहानियां' ज्यादा बिकती हैं। प्रेमचंद का 'गोदान' कम बिकता है लेकिन वेदप्रकाश शर्मा या ओमप्रकाश शर्मा नाम के किसी आदमी का 'वर्दी वाला गुंडा' ज्यादा बिकता है। लिहाजा बृजेश जी के नजरिए से प्रेमचंद छोटे साहित्यकार हैं।

प्रभाष जोशी होने का मतलब बृजेश जी नहीं समझ पाए हैं। प्रभाष जी ने रामबहादुर राय, आलोक तोमर, प्रदीप सिंह जैसे लोग दिए हैं जिन पर पत्रकारिता को नाज है। जबकि 'जागरण' जरनैल सिंह पैदा करता है। किसी का यह कहना कि खबर बेचने में बुराई क्या है, ठीक वैसा ही तर्क है कि एक भले घर की लड़की कॉलगर्ल बन जाए और कहे कि वह वेश्या नहीं है और शरीर तो उसका है, तो उसे बेचने में किसी को क्या आपत्ति है। अगर आलोक तोमर, प्रभाष जोशी के प्रवक्ता बनकर मैदान में उतरे तो बात समझ में आती है कि वे प्रभाष जी के शिष्य हैं और साथ में काम कर चुके हैं। लेकिन बृजेश जी तो 'जागरण' के बचाव में एक स्वामिभक्त मुलाजिम बनकर ही उतरे।

बृजेश जी को आलोक तोमर की भाषा से आपत्ति है। हर तथाकथित 'सभ्य' व्यक्ति को आम आदमी की भाषा से नफरत होती है उसकी नजर में 'हरामी' तो गाली है लेकिन 'बास्टर्ड' गीता के श्लोक की तरह है। और भिंड मुरैना की पुष्ठिभूमि से आना कोई अपराध नहीं है। जिस भिंड, मुरैना और चंबल की पुष्ठिभूमि पर बृजेश जी तंज कस रहे हैं, उस चंबल के डाकू बहुत मॉरल वाले लोग हुए हैं। बृजेश जी के लालाओं की तरह के नहीं। रही बात 'तिहाड़' की तो मेरा मानना है कि 'सच' बोलने की सजाओं में आलोक तोमर का तिहाड़ जाना और उमेश डोभाल का अंत, दोनों हो सकते हैं। लेकिन आलोक तोमर ने ना तो कभी चंद्रास्वामी से अपने संबंध छिपाए और न दाउद के भाई नूरा से। बृजेश जी ने शायद विनोद शुक्ला नाम के आदमी का नाम नहीं सुना है। अगर नहीं सुना है तो मालूम कर लें, वे जागरण के लखनऊ संस्करण के संपादक थे और क्या वे भी जेल गए थे? पर क्यों? इसी तरह बरेली में एक चंद्रकांत त्रिपाठी नाम के सज्जन हैं जो जागरण के सर्वेसर्वा हैं। उनकी जेब में कलम नहीं मिलेगी लेकिन दफ्तर में राइफल रखते हैं। बृजेश जी जरा भाषण देने से पहले अपने संस्थान की करतूतों पर एक सरसरी नजर ही डाल लेते।

अब अंत में मुद्दे की बात। चुनाव के दौरान कई बड़े अखबारों ने जैसा नंगई का नाच खेला और जनजागरण का अभियान भी चलाया, वह अमिताभ बच्चन के उस विज्ञापन की याद ताजा कर देता है जब निठारी कांड के बाद अमिताभ कह रहे थे कि -'यूपी में है दम/ चूंकि जुर्म यहां है कम'। क्या तमाशा है कि एक बड़ा अखबार चुनाव के दौरान अपील कर रहा है कि अपराधियों को वोट न दें और उसी पन्ने पर नक्सली नेता और कई संगीन वारदातों के आरोपी अब सांसद कामेश्वर बैठा का गुणगान कर रहा है कि वे बहुत भले आदमी हैं। वैसे भी प्रभाष जी ने किसी पत्रकार पर उंगली नहीं उठाई है, उन्होंने अखबार मालिकों को कठघरे में खड़ा किया है। फिर भी बृजेश जी जागरण के बचाव में खड़े हैं, तो सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि धूमिल ने जैसा कभी कहा था कि रामनामी बेचने से बेहतर रंडियों की दलाली करना है।

एक स्वामीभक्त मुलाजिम होने के नाते बृजेश जी का अपने लाला के बचाव में उतरना स्वाभाविक है। चूंकि ऐसा करने से उन्हें नौकरी में तरक्की भी मिल सकती है और पगार भी बढ़ सकती है। लेकिन इस देश में बहुत बड़ी संख्या उन पत्रकारों की है जो प्रभाष जोषी, कमलेश्वर,, राजेंद्र माथुर, अज्ञेय, धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय, उदयन शर्मा और एस पी सिंह जसे लोगों से प्रेरणा लेते रहे हैं लेकिन पूर्णचंद्र गुप्त, नरेंद्र मोहन या महेंद्र मोहन किस पत्रकार के आदर्श हैं, जरा प्रकाश डालें बृजेश जी!!!! 
saabhaar भड़ास4मीडिया
















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